होली का आध्यात्मिक रहस्य (Holi Festival)

4 Mar 2020

 

इस लेख में आपको होली मनाने का आध्यात्मिक महत्त्व समझाया जायेगा।  होली के क्या क्या अर्थ है? सच्चे अर्थ सहित होली कैसे मनाये? और परमपिता परमात्मा का अगवन सन्देश।  Visit General articles to access our all Articles in Hindi and English. Please SHARE this article to your relatives. (इस लेख को अपने परिवार मित्र आदि को भी SHARE करे।). To print or download this article, visit the HOLI - PDF version.  Visit English version of this article, Significance of Holi.

 

 

भारत त्योहारों की भूमि है, जिसमें होली के त्यौहार का एक विशेष महत्त्व है। होली का त्यौहार हम सभी बड़ी ख़ुशी के साथ मनाते है, होलिका दहन करतें है, एकदूसरें को बड़े प्यार से रंग लगाते है... क्या हम ऐसे ही इस त्यौहार को इस रीति से मनाते आए है या इसके पीछे कोई महीन रहस्य छिपा हुआ है?

 

➔ वास्तव में हमारे सभी त्यौहार हमारी अपनी जीवन-यात्रा से जुड़े है, वे हमारे ही दिव्य-परिवर्तन की यादगार है! भारत में ३३ कोटि देवी-देवताओं का गायन है, और सभी त्यौहार किसी न किसी रूप से देवी-देवताओं से संबंधित है। हम यह भी जानते है कि एक समय था जब भारत सोने की चिड़िया हुआ करता था, जिसे हम स्वर्ग / सतयुग कहते है, और इसी समय / युग में इसी धरा पर (भारत में) ३३ करोड़ देवी-देवताएं थे। क्या हम जानते है वे देवी-देवतायें अभी कहाँ है?

 

➔ सृष्टि चक्र का नियम ही है - युग परिवर्तन!  सतयुग - त्रेतायुग - द्वापरयुग - कलियुग से गुज़रते हुए हम आत्माएं अपनी दिव्यता से दूर होते गए और देवता से साधारण मनुष्य बन गए।  पवित्रता, शांति, प्रेम, सुख, समृद्धि जिसके हम अधिकारी हुआ करते थे, ५ विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) में गिरने से शोकवाटिका (कलियुग / दुखों की दुनिया / नर्क) में आ गए।  लेकिन अति के बाद अंत और घोर रात्रि के बाद नया सवेरा सुनिश्चित है। इस घोर कलियुग के बाद सतयुग लाना किसी भी साधारण आत्मा का काम नहीं है, और इसी लिए ऐसे समय में, कल्प के अंत में (कल्प में एक बार ही) निराकार परमात्मा शिव स्वयं इस धरा पर अवतरित होते है सतयुग की स्थापना के लिए! परमात्म अवतरण समय से लेकर सतयुग की शुरुआत के समय को संगमयुग कहते है। (परमात्मा का अवतरण हो चुका है।) हमारे सभी त्यौहार वर्तमान समय की यादगार है जब हम परमात्मा से सीधा संबंध जोड़कर अपने जीवन को सुखमय बनाते है और सृष्टि पर स्वर्ग निर्माण में अपना योगदान देकर फिर से स्वर्ग के मालिक बनते है।

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✿ Holy  - पवित्रता ✿
 

➔ काम विकार को महाशत्रु कहा गया है, इसी में गिरने से हमने हमारा प्यारा स्वर्ग खोया है (जिसकी नूँध The Holy Bible में भी है - They ate the forbidden fruit & lost Paradise.) विकारों पर जीत पाने से ही सतयुग की स्थापना होती है। संस्कार परिवर्तन से ही विश्व परिवर्तन संभव है। परमात्मा हमें हमारे ओरिजिनल संस्कारों की याद दिलाते है, जिसमें पवित्रता मुख्य है। पवित्रता सुख और शांति की जननी है, सर्व प्राप्तियों की चाबी है। पवित्रता का यथार्थ अर्थ सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं बल्कि मन-कर्म-वचन संपूर्ण रूप से शुद्ध बनना है। जब हमें परमात्म दिव्य सन्देश मिलता है और हम अपने जीवन में प्रैक्टिकल में पवित्रता की धारणा कर फिर से हमारे दैवी गुणों को इमर्ज करते है तब इस धरा पर सतयुग आता है। होली का त्यौहार पवित्रता की इसी धारणा का यादगार है।
 

✼ हो ली (बीता सो बीता)- Past is Past... ✼
 

➔ हरेक के जीवनकाल में बहोत सी बातें आती है... कई बार सालों बीत जाते है लेकिन हम कहते है - "ये बात कभी नहीं भूलेगी"... हम यह भी जानते है कि बातों को पकड़कर रखने में हमारी सेहत, स्वास्थ्य और रिश्तों का भरपूर नुकसान है।  परमात्मा हमें याद दिलाता है कि हम सभी एक बाप के बच्चे, आपस में भाई - भाई है, समग्र विश्व एक परिवार है।  जो हुआ सो हुआ, बीती को बिंदी लगाओ और प्यार से सब को साथ रख़कर आगे बढ़ो...
 

★ Ho Li (हो गयी एक शिव बाबा की)- I Belong to One ★
 

"तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो... " - प्रार्थनाओं में हम जो गाते आए है उसे प्रैक्टिकल में अनुभव करने का समय वर्तमान समय है।  पिता, माता, सखा, बंधु, जीवनसाथी... हमारे सर्व संबंध वास्तविक रूप में उस एक परमात्मा से ही है।  सदियों से हमने उसे पुकारा है... और अब जब वो आया है तब जैसे एक नदिया सागर से मिलने के लिए उत्सुक होती है, और सागर मिलने पर उसमे ऐसे समा जाती है जैसे अलग किया ही न जा सके... वैसे हम आत्मा परमात्मा के संग में रहकर उसके रंग में रंग जाते है। मैं आत्मा परमात्मा की हो ली... ईश्वर को समर्पण होना अर्थात - स्वयं के और विश्व के कल्याण अर्थ अपने जीवन को मनमत पर न चला कर, परमात्म मत (श्रीमत) पर चलाना।

 

साथ ही, जैसा संग वैसा रंग। परमात्मा के संग (यथार्थ सत्संग) से हम भी उनके जैसे बनते जाते है - शांत स्वरूप, प्रेम स्वरूप, शक्ति स्वरूप... और फिर यही स्नेह, प्यार और सम्मान का परमात्म रंग हम औरों को भी लगाते है।  होली के त्यौहार पर एक दूसरे को रंग लगाना इसी का यादगार है। 

 

परमात्मा की लगन में मगन और निरंतर याद को योग-अग्नि कहा जाता है जिससे हमारे जन्म-जन्मांतर के विकर्म विनाश होते है, आत्मा सभी विकारों से मुक्त होकर पावन बनती है।  इसी योग-अग्नि की यादगार में होली के त्यौहार पर स्थूल अग्नि जलाई जाती है। पहले होली जलाई जाती है फिर ही मनाई जाती है - अर्थात अपने विकारों को जलाने (ख़त्म करने) पर ही सच्चे अर्थ में जीवन की ख़ुशी मनाई जा सकती है । 

 

✪ (Hindi) BK Suraj bhai Sharing the Secrets of HOLI festival ✪

Samadhan episode on ''Holi''

 

 

(video 2) Holi celebration with meaning -> https://youtu.be/jdymW55qQAM

 

 

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