आत्मिक दृष्टि से सेवा (Service through Eyes)

23 Mar 2019

आत्मिक दृष्टि से सेवा (Service through Yog Dhristi or Sakash or Vibration). Hindi article by BK Anil.

 

Question: 

चलते फिरते आत्मिक दृष्टि से किसी को देखें तो क्या इसमें सेवा समाया हुआ है? क्या इसमें वह आत्मा को बाबा की टचिंग होगी ?
 


Answer:

 

सेवा तो आखिरी सब्जेक्ट है जो परिणाम है पहले तीन सब्जेक्ट का । वास्तव में देखा जाए तो हमारा जो साप्ताहिक राजयोग कोर्स है उसकी शुरुआत ही *आत्मा* के पाठ से होती है और हमारी पढाई का अंत भी तभी होगा जब सभी ब्राह्मण *आत्मिक स्वरुप* में स्थित हो जायेंगे जो हमारा *वास्तविक स्वरुप* है ।

 

ब्राह्मण जीवन का सारा पुरुषार्थ ही वास्तविक – ओरिजिनल स्वरुप में स्थित होने का है। यदि इस स्वरुप में स्थित होने में देरी हो रही है तो अभ्यास को और बढ़ाना चाहिए और जब तक यह पक्का नहीं हो जाता तब तक थकना नहीं है रुकना नहीं है । आत्मिक स्मृति में रहना ही *सच्चा ज्ञान* है, परमात्मा से योग लगाने के लिए भी पहले आत्मिक स्वरुप में स्थित होना जरुरी है, यही सहज *राजयोग का आधार है ।

 

विश्व का राज्य प्राप्त करने के लिए *स्वराज्य अधिकारी* बनना जरुरी है याने आत्मा का कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण जिस प्रकार देवता बनने के लिए ब्राह्मण सो फ़रिश्ता बनना जरुरी है । भाई भाई की दृष्टी भी तभी साकार होती है जब आत्मिक दृष्टी रहती है याने आत्मिक स्मृति में होते हैं । आत्मिक स्मृति भी तभी जगती है जब स्वयं देह और देह की दुनिया से ऊपर उठकर एक परमात्मा की संतान समझते हुए परमधाम निवासी समझते हैं । कर्मातीत बनाने का, फ़रिश्ता बनने का आधार ही आत्मिक स्मृति है।

 

जब तक सभी ब्राह्मण इस अभ्यास में पूर्णता व सिद्धि को प्राप्त नहीं करते तब तक नयी दुनिया को नहीं लाया जा सकता । क्योंकि *नयी दुनिया* का आधार ही आत्मिक वृत्ति, आत्मिक दृष्टि व आत्मिक स्नेह है। आत्मिक दृष्टि से किसी को जब देखते हैं जो वह जैसे एक पावरफुल beam अथवा किरण के तरह काम करता है औरे सीधे आत्मा को तीर की तरह भेदता है और सामने वाला भी उसी स्थिति का अनुभव करने लगता है जिससे वह देहभान भूल अशरीरी बन जाता है जैसे ब्रह्मा बाप के सामने आते अनुभव करते थे ।

 

यही है *बाप समान स्थिति* । इस स्थिति में बाप के साथ *कंबाइंड स्वरुप* की अनुभूति होने लगती है । इसलिये *अब समय अनुसार ज्यादा से ज्यादा आत्मिक स्वरुप के अभ्यास पर ही निरंतर जोर देना चाहिए । यही अभ्यास फ़रिश्ता स्वरुप में स्थित करने में सहयोगी बनेगी और अंतिम सेवा जो बाबा चाहते हैं “ अन्तःवाहक शरीर द्वारा सेवा उसमें सहयोगी बन सकेंगे* । ओम शांति

 

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