31 Oct 2018 BK murli in Hindi - Aaj ki Murli

30 Oct 2018

Brahma kumaris murli today in Hindi Aaj ki Gyan Murli Madhuban 31-10-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन'

 

'मीठे-बच्चे - तुम आत्माओं को अपना-अपना रथ है, मैं हूँ निराकार, मुझे भी कल्प में एक ही बार रथ चाहिए, मैं ब्रह्मा का अनुभवी वृद्ध रथ उधार लेता हूँ''

 

प्रश्नः-

किस निश्चय के आधार पर शरीर का भान भूलना अति सहज है?

उत्तर:-

तुम बच्चों ने निश्चय से कहा - बाबा, हम आपके बन गये, तो बाप का बनना माना ही शरीर का भान भूलना। जैसे शिवबाबा इस रथ पर आता और चला जाता, ऐसे तुम बच्चे भी प्रैक्टिस करो इस रथ पर आने-जाने की। अशरीरी बनने का अभ्यास करो। इसमें मुश्किल का अनुभव नहीं होना चाहिए। अपने को निराकारी आत्मा समझ बाप को याद करो।

 

गीत:- ओम् नमो शिवाए......

 ओम् शान्ति।शिवबाबा बच्चों को इस ब्रह्मा के रथ द्वारा समझाते हैं क्योंकि बाप बच्चों से ही पूछते हैं मुझे अपना रथ तो है नहीं। मुझे रथ तो जरूर चाहिए। जैसे तुम हर एक आत्मा को अपना-अपना रथ है ना। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी सूक्ष्म शरीर है ना। लक्ष्मी-नारायण आदि सब आत्माओं को शरीर रूपी रथ है जरूर, जिसको अश्व कहते हैं। हैं तो मनुष्य ना। मनुष्यों की ही बात समझाई जाती है, जानवरों की बातें जानवर जानें। यहाँ तो मनुष्य सृष्टि है तो बाप भी मनुष्यों को बैठ समझाते हैं। मनुष्य में भी जो आत्मा है, उनको बैठ समझाते हैं। डायरेक्ट पूछते हैं तुम हर एक को अपना-अपना शरीर है ना। हर एक आत्मा शरीर लेती और छोड़ती है। मनुष्य तो कह देते कि आत्मा 84 लाख जन्म लेती है। यह भूल है जबकि तुम 84 जन्म लेकर ही बिल्कुल फाँ हो गये हो (थक गये हो), कितने तंग हो गये हो। तो 84 लाख जन्मों की तो बात ही नहीं। यह हैं मनुष्यों के गपोड़े। तो बाप समझाते हैं तुम आत्माओं का भी अपना-अपना रथ है। मुझे भी तो रथ चाहिए ना। मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ। गाते भी हैं पतित-पावन, ज्ञान का सागर...तुम और कोई को पतित-पावन नहीं कहेंगे। लक्ष्मी-नारायण आदि को भी नहीं कहेंगे। पतित सृष्टि को पावन बनाने वाला अर्थात् पावन सृष्टि स्वर्ग का रचयिता, परमपिता परमात्मा बिगर कोई हो नहीं सकता। सुप्रीम फादर वही है। बाप जानते हैं तुम नम्बरवार पत्थरबुद्धि से पारस बुद्धि बन रहे हो। बाहर वाले मनुष्य यह नहीं जानते। तो बाप समझाते हैं मुझे भी जरूर रथ तो चाहिए ना। मुझ पतित-पावन को जरूर पतित दुनिया में आना पड़े ना। प्लेग की बीमारी होती है तो डॉक्टर को प्लेगियों के पास आना पड़ेगा। बाप कहते हैं तुम्हारे में 5 विकारों की बीमारी आधाकल्प की है। मनुष्य तो दु:ख देने वाले हैं। इन 5 विकारों से तुम बिल्कुल ही पतित बन गये हो। तो बाप समझाते हैं मुझे पतित दुनिया में ही आना पड़े ना। पतित को ही भ्रष्टाचारी कहा जाता है, पावन को श्रेष्ठाचारी कहेंगे। बरोबर तुम्हारा भारत पावन श्रेष्ठाचारी था, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। जिसकी ही महिमा गाते हो सर्वगुण सम्पन्न... वहाँ सब सुखी थे। यह तो कल की बात है। तो बाप कहते हैं मैं आऊं तो कैसे आऊं, किसके शरीर में आऊं? पहले तो मुझे प्रजापिता चाहिए। सूक्ष्म वतनवासी को यहाँ कैसे ले आ सकता? वह तो फरिश्ता है ना। उनको पतित दुनिया में ले आऊं - यह तो दोष हो जाए। कहेंगे मैंने क्या गुनाह किया? बाप बड़ी रमणीक बातें समझाते हैं। समझेगा वही जो बाप का बना होगा। घड़ी-घड़ी बाप को याद करता रहेगा।बाप कहते हैं मैं आता ही तब हूँ जब धरती पर पाप बढ़ जाता है। कलियुग में मनुष्य कितने पाप करते हैं। तो बाप पूछते हैं - बच्चे, बताओ मैं आऊं तो किस तन में आऊं? मुझे चाहिए भी जरूर वृद्ध अनुभवी रथ। यह जो मैंने रथ लिया है, बरोबर इनके बहुत गुरू किये हुए हैं। शास्त्र आदि पढ़ा हुआ है। यह भी लिखा हुआ है ना कि बहुत पढ़ा हुआ था। अर्जुन की बात नहीं। मुझे कोई अर्जुन वा कृष्ण का रथ थोड़ेही चाहिए। मुझे तो चाहिए ब्रह्मा का रथ, उनको ही प्रजापिता कहेंगे। कृष्ण को तो प्रजापिता नहीं कहेंगे। बाप को तो ब्रह्मा का ही रथ चाहिए जिससे ब्राह्मणों की प्रजा रचे। ब्राह्मणों का है सर्वोत्तम कुल। विराट रूप दिखाते हैं ना। देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, बाकी ब्राह्मण कहाँ गये? यह किसको भी पता नहीं। ऊंच ते ऊंच है ब्राह्मणों की चोटी। चोटी हो तब ही समझा जाता है कि यह ब्राह्मण है। सच्ची-सच्ची चोटी तो तुम्हारी है। तुम राजऋषि हो, बड़ी चोटी वाले। ऋषि उनको कहा जाता जो पवित्र रहते हैं। तुम हो राज-योगी, राजऋषि। राजाई के लिए तपस्या कर रहे हो। वह मुक्ति के लिए हठयोग की तपस्या करते हैं, तुम जीवनमुक्ति, राजाई के लिए राजयोग की तपस्या कर रहे हो। तुम्हारा नाम ही है शिव शक्ति। शिवबाबा तुम्हें रीइनकारनेट करते हैं। तो तुम फिर से भारत में जन्म लेते हो। जन्म लिया है ना। कोई-कोई ने भल जन्म लिया है परन्तु समझते नहीं कि हम शिवबाबा के बने हैं, उनके पास जन्म लिया है। अगर ऐसा समझें तो शरीर का भान बिल्कुल ही निकल जाना चाहिए। जैसे शिवबाबा निराकार इस रथ में है, तुम भी अपने को निराकार आत्मा समझो। बाप कहते हैं - बच्चे, मुझे याद करो। अब वापिस घर चलना है। तुम तो पहले अशरीरी थे फिर देवी वा देवता का शरीर लिया, फिर क्षत्रिय शरीर, फिर वैश्य शरीर, फिर शूद्र शरीर लिया। अभी फिर तुम अशरीरी बनो। तुम मुझ निराकार को ही कहते हो - बाबा, अभी हम आपके बने हैं, हमको वापिस जाना है। देह को तो ले नहीं चलना है। हे आत्मायें, अब मुझ बाप को और स्वीट होम को याद करो। मनुष्य जब विलायत से लौटते हैं तो कहते हैं - चलो, अपने स्वीट होम भारत में चलें। जहाँ जन्म लिया था वहाँ लौटें। मनुष्य मरते हैं तो जहाँ जन्म लिया था उनको वहाँ ले जाते हैं। समझते हैं भारत की मिट्टी का बना हुआ है तो वह मिट्टी भारत में ही छोड़ें।बाप कहते हैं मेरा जन्म भी भारत में है। शिव जयन्ती भी मनाते हो। मेरे नाम तो ढेर रख दिये हैं। कहते हैं हर-हर महादेव, सबके दु:ख काटने वाला, वह भी मैं ही हूँ, शंकर नहीं है। ब्रह्मा सर्विस पर हाज़िर है। और फिर जो स्थापना करते हैं वही विष्णु के दो रूप से पालना करेंगे। मुझे प्रजापिता ब्रह्मा जरूर चाहिए। आदि देव का बरोबर मन्दिर भी है। आदि देव किसका बच्चा है? कोई बताये। इस देलवाड़ा मन्दिर के जो ट्रस्टी लोग हैं वह भी यह नहीं जानते कि आदि देव है कौन? उनका बाप कौन था? आदि देव प्रजापिता ब्रह्मा है, उनका बाप है शिव। यह जगतपिता, जगत अम्बा का यादगार मन्दिर है। इस आदि देव ब्रह्मा के रथ में बाप ने बैठ ज्ञान सुनाया है। कोठरी में सब बच्चे बैठे हैं। सभी का मन्दिर तो नहीं बनायेंगे। मुख्य है 108 की माला, तो 108 कोठरियां बना दी हैं। 108 की ही पूजा होती है। मुख्य है शिवबाबा फिर ब्रह्मा-सरस्वती युगल। वह शिवबाबा है फूल। उनको अपना शरीर नहीं है। ब्रह्मा-सरस्वती को अपना शरीर है। माला शरीरधारियों की बनी हुई है। सब माला को पूजते हैं। पूजकर पूरा करेंगे फिर शिवबाबा को नमस्कार करेंगे, माथा झुकायेंगे क्योंकि उसने इन सबको पतित से पावन बनाया है इसलिए पूजी जाती है। माला हाथ में ले बैठ राम-राम कहते हैं। परमपिता परमात्मा के नाम का किसको पता नहीं है। शिवबाबा है मुख्य फिर प्रजापिता ब्रह्मा और सरस्वती भी मुख्य हैं। बाकी ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ जो-जो पुरुषार्थ करते रहते हैं उन्हों के नाम होंगे। आगे चल तुम सब देखते रहेंगे। जब पिछाड़ी होगी तब तुम यहाँ आकर रहेंगे। जो पक्के योगी होंगे वही रह सकेंगे। भोगी तो थोड़ा ठका सुनने से ख़त्म हो जायेंगे। कोई का आपरेशन देखने से भी मनुष्य अनकॉन्सेस हो जाते हैं। अभी पार्टीशन में कितने मनुष्य मरे। वो लोग तो गपोड़े मारते रहते हैं कि हमने बिगर कोई लड़ाई राज्य ले लिया। परन्तु मरे इतने जो बात मत पूछो। यह है ही झूठी माया.... अभी सच्चा बाप बैठ तुमको सच सुनाते हैं। बाप कहते हैं मुझे रथ तो जरूर चाहिए। मैं साजन बड़ा हूँ तो सजनी भी बड़ी चाहिए। सरस्वती है ब्रह्मा मुख वंशावली। वह कोई ब्रह्मा की युगल नहीं है, ब्रह्मा की बेटी है। उनको फिर जगत अम्बा क्यों कहते हैं? क्योंकि यह मेल है ना, तो माताओं की सम्भाल के लिए उनको रखा है। ब्रह्मा मुख वंशावली सरस्वती तो ब्रह्मा की बेटी हो गई। मम्मा तो जवान है, ब्रह्मा तो बूढ़ा है। सरस्वती जवान, ब्रह्मा की स्त्री शोभती भी नहीं। हाफ पार्टनर कहला न सके। अभी तुम समझ गये हो। तो बाप कहते हैं मुझे इस ब्रह्मा का शरीर लोन लेना पड़ता है। उधार पर तो बहुत लेते हैं। ब्राह्मण को खिलाते हैं तो वह आत्मा आकर ब्राह्मण के शरीर का आधार लेगी। आत्मा वह शरीर छोड़कर आती है क्या? नहीं, यह तो बच्चों को समझाया गया है कि ड्रामा में साक्षात्कार की रस्म-रिवाज पहले से नूँध है। यहाँ भी बुलाते हैं। ऐसे नहीं कि आत्मा शरीर छोड़कर आयेगी। नहीं, यह ड्रामा में नूँध है। बाप के लिए तो यह रथ नंदीगण है। नहीं तो शिव के मन्दिर में बैल क्यों दिखाते? सूक्ष्म वतन में शंकर के पास बैल कहाँ से आया? वहाँ तो है ही ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और वह युगल दिखाते हैं। प्रवृत्ति मार्ग दिखाते हैं। बाकी वहाँ जानवर कहाँ से आया? मनुष्यों की बुद्धि कुछ भी काम नहीं करती, जो आता है सो कहते रहते। जिससे वेस्ट ऑफ टाइम, वेस्ट ऑफ एनर्जी होती है।तुम कहते हो हम सो पावन देवता थे फिर पुनर्जन्म लेते-लेते हम पतित पुजारी बने हैं। आपे ही पूज्य, आपेही पुजारी। पूज्य और पुजारी कोई भगवान् नहीं बनता। उनको थोड़ेही 84 जन्म लेने पड़ते। माया मनुष्यों को बिल्कुल पत्थरबुद्धि बना देती है। हम सो का अर्थ यह नहीं कि हम आत्मा सो परमात्मा हैं, नहीं। हम सो ब्राह्मण, सो देवता बनेंगे। पुनर्जन्म लेते आयेंगे। कितनी अच्छी समझानी है। बाप कहते हैं मैंने जिसमें प्रवेश किया है, इसने बहुत गुरू किये, शास्त्र पढ़े हैं, जन्म भी पूरे 84 लिए हुए हैं। यह नहीं जानता, हम तुमको इन सहित बताता हूँ। ब्रह्मा को भी बतलाता हूँ। सदैव भी तो सवारी नहीं कर सकता हूँ। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मणों को बतलाता हूँ। मुझे रथ भी चाहिए ना। तुम बच्चे याद करते हो और मैं आ जाता हूँ। मुझे तो सर्विस करनी है तो श्री श्री शिव की मत से भारत पावन बनता है। नर्कवासियों को श्री श्री का टाइटिल देना रांग है। आगे श्री नाम नहीं था। अभी तो सबको श्री अर्थात् श्रेष्ठ बना दिया है। श्री श्री तो है शिवबाबा। फिर सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर फिर श्री लक्ष्मी-नारायण। यह समझने की बातें हैं। नॉलेज बड़ी मज़े की है। परन्तु कोई-कोई पढ़ते-पढ़ते रफू-चक्कर हो जाते हैं। माया हाथ छुड़ा देती है। दुकान भी नम्बरवार हैं। बड़ी दुकान में जरूर अच्छे सेल्स मैन होंगे। छोटे-छोटे में कम होंगे। तो बड़ी दुकान पर जाना चाहिए जहाँ महारथी हों। माताओं को तो टाइम बहुत रहता है। पुरुषों को धंधा आदि करना है तो बिजी रहते हैं। मातायें तो फ्री हैं। खाना पकाया बस। वह तुम पर फिर बंधन डालते हैं। सुनते हैं ब्रह्माकुमारियों पास जाने से विष बंद हो जायेगा, तो रोकते हैं।शिवबाबा ऐसी तिरकनी (फिसलने वाली) चीज़ है जो घड़ी-घड़ी भूल जाती है। बाप बिल्कुल सहज रास्ता बताते हैं कि मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप भी कट जायेंगे और मेरे पास भी आ जायेंगे। याद नहीं करेंगे तो पाप भी नहीं कटेंगे और साथ भी नहीं ले जाऊंगा। फिर सजा खानी पड़ेगी। भक्ति मार्ग में छांछ पीते आये। मक्खन तो तुमने सतयुग-त्रेता में खाकर पूरा कर दिया। बाकी पीछे छांछ रह जाती है। छांछ भी पहले अच्छी मिलती फिर पानी मिलता है। सतयुग-त्रेता में घी दूध की नदी बहती है। अभी तो घी कितना महंगा हो गया है। अच्छा!

 

मात-पिता बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

 

1) राजऋषि बन तपस्या करनी है। पूज्यनीय माला में आने के लिए बाप समान सर्विस करनी है। पक्का योगी बनना है।

 

2) नॉलेज बड़ी मज़े की है, इसलिए रमणीकता से पढ़ना है, मूँझना नहीं है।

 

वरदान:- वरदानों की दिव्य पालना द्वारा सहज और श्रेष्ठ जीवन का अनुभव करने वाले सदा खुशनसीब भव

 

बापदादा संगमयुग पर सभी बच्चों की तीन संबंधों से पालना करते हैं। बाप के संबंध से वर्से की स्मृति द्वारा पालना, शिक्षक के संबंध से पढ़ाई की पालना और सतगुरू के संबंध से वरदानों के अनुभूति की पालना.. एक ही समय पर सबको मिल रही है, इसी दिव्य पालना द्वारा सहज और श्रेष्ठ जीवन का अनुभव करते रहो। मेहनत और मुश्किल शब्द भी समाप्त हो जाए तब कहेंगे खुशनसीब।

 

स्लोगन:- बाप के साथ-साथ सर्व आत्माओं के स्नेही बनना ही सच्ची सद्भावना है।

Share on Facebook
Please reload

Please reload

Recent Posts
Please reload

*Thought for Today*

Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidhyalaya

 (Godly Spiritual University)

Established by God, this is the World Spiritual University for Purification of Souls by the knowledge and RajYog taught by the Supreme Soul (God), giving his most beneficial advice. 

Established in 1936, by today has more than 8500 centres in about 140 countries. World is transforming into New. This is task of God. God has come and is playing incognito role of transforming the world. Come and know .more

Useful links 

Wisdom

Services
Main Address :

Om Shanti Bhawan, 

Madhuban, Mount Abu 

Rajasthan, India  307501

Download App :

brahmakumariz.com

brahmakumarisofficial.com

© 2018  Shiv Baba in service of all children

Search tool png - BK website
BK Shivani YouTube
Brahma Kumaris SoundCloud
Facebook grey logo with Black background
Instagram grey logo with Black background

'Relationship is made only to SHARE what we have, not to demand anything from the other.'