आज की मुरली 30 Dec 2018 BK murli in Hindi

29 Dec 2018

BrahmaKumaris murli today in Hindi Aaj ki Gyan Murli madhuban 30-12-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 02-04-84 मधुबन

 

बिन्दू का महत्व

 

आज भाग्य-विधाता बाप सर्व भाग्यवान बच्चों से मिलने आये हैं। भाग्य विधाता बाप सभी बच्चों को भाग्य बनाने की अति सहज विधि बता रहे हैं। सिर्फ बिन्दु के हिसाब को जानो। बिन्दु का हिसाब सबसे सहज है। बिन्दु के महत्व को जाना और महान बने। सबसे सहज और महत्वशाली बिन्दु का हिसाब सभी अच्छी तरह से जान गये हो ना! बिन्दु कहना और बिन्दु बनना। बिन्दु बन बिन्दु बाप को याद करना है। बिन्दु थे और अब बिन्दु स्थिति में स्थित हो बिन्दु बाप समान बन मिलन मनाना है। यह मिलन मनाने का युग, उड़ती कला का युग कहा जाता है। ब्राह्मण जीवन है ही मिलने और मनाने के लिए। इसी विधि द्वारा सदा कर्म करते हुए कर्मों के बन्धन से मुक्त कर्मातीत स्थिति का अनुभव करते हो। कर्म के बन्धन में नहीं आते लेकिन सदा बाप के सर्व सम्बन्ध में रहते हो। करावन-हार बाप निमित्त बनाए करा रहे हैं। तो स्वयं साक्षी बन गये, इसलिए इस सम्बन्ध की स्मृति बन्धनमुक्त बना देती है। जहाँ सम्बन्ध से करते वहाँ बन्धन नहीं होता। मैंने किया, यह सोचा तो सम्बन्ध भूला और बन्धन बना! संगमयुग बन्धन-मुक्त, सर्व सम्बन्ध युक्त, जीवन-मुक्त स्थिति के अनुभव का युग है। तो चेक करो सम्बन्ध में रहते हो या बन्धन में आते? सम्बन्ध में स्नेह के कारण प्राप्ति है, बन्धन में खींचातान, टेन्शन के कारण दु:ख और अशान्ति की हलचल है इसलिए जब बाप ने बिन्दु का सहज हिसाब सिखा दिया तो देह का बन्धन भी समाप्त हो गया। देह आपकी नहीं है। बाप को दे दिया तो बाप की हुई। अब आपका निजी बन्धन, मेरा शरीर या मेरी देह - यह बन्धन समाप्त हुआ। मेरी देह कहेंगे क्या, आपका अधिकार है? दी हुई वस्तु पर आपका अधिकार कैसे हुआ? दे दी है वा रख ली है? कहना तेरा और मानना मेरा, यह तो नहीं है ना!जब तेरा कहा तो मेरे-पन का बन्धन समाप्त हो गया। यह हद का मेरा, यही मोह का धागा है। धागा कहो, जंजीर कहो, रस्सी कहो, यह बन्धन में बांधता है। जब सब कुछ आपका है, यह सम्बन्ध जोड़ लिया तो बन्धन समाप्त हो सम्बन्ध बन जाता है। किसी भी प्रकार का बन्धन चाहे देह का, स्वभाव का, संस्कार का, मन के झुकाव का.. यह बन्धन सिद्ध करता है बाप से सर्व सम्बन्ध की, सदा के सम्बन्ध की कमजोरी है। कई बच्चे सदा और सर्व सम्बन्ध में बन्धन मुक्त रहते, और कई बच्चे समय प्रमाण मतलब से सम्बन्ध जोड़ते हैं, इसलिए ब्राह्मण जीवन का अलौकिक रूहानी मजा पाने से वंचित रह जाते हैं। न स्वयं, स्वयं से सन्तुष्ट और न दूसरों से सन्तुष्टता का आशीर्वाद ले सकते। ब्राह्मण जीवन श्रेष्ठ सम्बन्धों का जीवन है ही बाप और सर्व ब्राह्मण परिवार का आशीर्वाद लेने का जीवन। आशीर्वाद अर्थात् शुभ भावनायें, शुभ कामनायें। आप ब्राह्मणों का जन्म ही बापदादा की आशीर्वाद कहो, वरदान कहो, इसी आधार से हुआ है। बाप ने कहा आप भाग्यवान श्रेष्ठ विशेष आत्मा हो, इसी स्मृति रूपी आशीर्वाद वा वरदान से शुभ भावना, शुभ कामना से आप ब्राह्मणों का नया जीवन, नया जन्म हुआ है। सदा आशीर्वाद लेते रहना। यही संगमयुग की विशेषता है! लेकिन इन सबका आधार सर्व श्रेष्ठ सम्बन्ध है। सम्बन्ध मेरे-मेरे की जंजीरों को, बन्धन को सेकण्ड में समाप्त कर देता है। और सम्बन्ध का पहला स्वरूप वो ही सहज बात है - बाप भी बिन्दु, मैं भी बिन्दु और सर्व आत्मायें भी बिन्दु। तो बिन्दु का ही हिसाब हुआ ना। इसी बिन्दु में ज्ञान का सिन्धु समाया हुआ है। दुनिया के हिसाब में भी बिन्दु 10 को 100 बना देता और 100 को हजार बना देता है। बिन्दु बढ़ाते जाओ और संख्या बढ़ाते जाओ। तो महत्व किसका हुआ? बिन्दु का हुआ ना। ऐसे ब्राह्मण जीवन में सर्व प्राप्ति का आधार बिन्दु है।अनपढ़ भी बिन्दु सहज समझ सकते हैं ना! कोई कितना भी व्यस्त हो, तन्दरूस्त न हो, बुद्धि कमजोर हो लेकिन बिन्दु का हिसाब सब जान सकते। मातायें भी हिसाब में तो होशियार होती हैं ना। तो बिन्दु का हिसाब सदा याद रहे। अच्छा!सर्व स्थानों से अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा भी सभी बच्चों को अपने भाग्य बनाने की मुबारक देते हैं। अपने घर में आये हैं। यही अपना घर दाता का घर है। अपना घर आत्मा और शरीर को आराम देने का घर है। आराम मिल रहा है ना! डबल प्राप्ति है। आराम भी मिलता, राम भी मिलता। तो डबल प्राप्ति हो गई ना! बाप के घर का बच्चे श्रृंगार हैं। बापदादा घर के श्रृंगार बच्चों को देख रहे हैं। अच्छा!सदा सर्व सम्बन्ध द्वारा बन्धन मुक्त, कर्मातीत स्थिति का अनुभव करने वाले, सदा बिन्दु के महत्व को जान महान बनने वाले, सदा सर्व आत्माओं द्वारा सन्तुष्टता की शुभ भावना, शुभ कामना की आशीर्वाद लेने वाले, सर्व को ऐसी आशीर्वाद देने वाले, सदा स्वयं को साक्षी समझ निमित्त भाव से कर्म करने वाले, ऐसे सदा अलौकिक रूहानी मौज मनाने वाले, सदा मजे की जीवन में रहने वाले, बोझ को समाप्त करने वाले, ऐसे सदा भाग्यवान आत्माओं को भाग्य विधाता बाप की याद प्यार और नमस्ते।दादियों से:- समय तीव्रगति से जा रहा है। जैसे समय तीव्रगति से चलता जा रहा है - ऐसे सर्व ब्राह्मण तीव्रगति से उड़ते हैं। इतने हल्के डबल लाइट बने हैं? अभी विशेष उड़ाने की सेवा है। ऐसे उड़ाती हो? किस विधि से सबको उड़ाना है? क्लास सुनते-सुनते क्लास कराने वाले बन गये। जो भी विषय आप शुरू करेंगे उसके पहले उस विषय की प्वाइंट्स सबके पास होंगी। तो कौन-सी विधि से उड़ाना है, इसका प्लैन बनाया है? अभी विधि चाहिए हल्का बनाने की। यह बोझ ही नीचे ऊपर लाता है। किसको कोई बोझ है, किसको कोई बोझ है। चाहे स्वयं के संस्कारों का बोझ, चाहे संगठन का... लेकिन बोझ उड़ने नहीं देगा। अभी कोई उड़ते भी हैं तो दूसरे के जोर से। जैसे खिलौना होता है उसको उड़ाते हैं, फिर क्या होता? उड़कर नीचे जा जाता। उड़ता जरूर है लेकिन सदा नहीं उड़ता। अभी जब सर्व ब्राह्मण आत्मायें उड़ें तब और आत्माओं को उड़ाकर बाप के नजदीक पहुँचा सकें। अभी तो उड़ाने के सिवाए, उड़ने के सिवाए और कोई विधि नहीं है। उड़ने की गति ही विधि है। कार्य कितना है और समय कितना है?अभी कम से कम 9 लाख ब्राह्मण तो पहले चाहिए। ऐसे तो संख्या ज्यादा होगी लेकिन सारे विश्व पर राज्य करेंगे तो कम से कम 9 लाख तो हों। समय प्रमाण श्रेष्ठ विधि चाहिए। श्रेष्ठ विधि है ही उड़ाने की विधि। उसका प्लैन बनाओ। छोटे-छोटे संगठन तैयार करो। कितने वर्ष अव्यक्त पार्ट को भी हो गया! साकार पालना, अव्यक्त पालना कितना समय बीत गया। अभी कुछ नवीनता करनी है ना। प्लैन बनाओ। अब उड़ने और नीचे आने का चक्र तो पूरा हो। 84 जन्म हैं, 84 का चक्र गाया हुआ है। तो 84 में जब यह चक्र पूरा होगा तब स्वदर्शन चक्र दूर से आत्माओं को समीप लायेगा। यादगार में क्या दिखाते हैं? एक जगह पर बैठे चक्र भेजा और वह स्वदर्शन चक्र स्वयं ही आत्माओं को समीप ले आया। स्वयं नहीं जाते, चक्र चलाते हैं। तो पहले यह चक्र पूरे हों तब तो स्वदर्शन चक्र चलें। तो अभी 84 में यह विधि अपनाओ जो सब हद के चक्र समाप्त हों, ऐसे ही सोचा है ना। अच्छा!टीचर्स से:- टीचर्स तो हैं ही उड़ती कला वाली! निमित्त बनना - यही उड़ती कला का साधन है। तो निमित्त बने हो अर्थात् ड्रामा अनुसार उड़ती कला का साधन मिला हुआ है। इसी विधि द्वारा सदा सिद्धि को पाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। निमित्त बनना ही लिफ्ट है। तो लिफ्ट द्वारा सेकण्ड में पहुँचने वाले उड़ती कला वाले हुए। चढ़ती कला वाले नहीं, हिलने वाले नहीं, लेकिन हिलाने से बचाने वाले। आग की सेक में आने वाले नहीं लेकिन आग बुझाने वाले। तो निमित्त की विधि से सिद्धि को प्राप्त करो। टीचर्स का अर्थ ही है निमित्त भाव। यह निमित्त भाव ही सर्व फल की प्राप्ति स्वत: कराता है। अच्छा!अव्यक्त महावाक्य - कर्मबन्धन मुक्त कर्मातीत, विदेही बनोविदेही व कर्मातीत स्थिति का अनुभव करने के लिए हद के मेरे-मेरे के देह-अभिमान से मुक्त बनो। लौकिक और अलौकिक, कर्म और सम्बन्ध दोनों में स्वार्थ भाव से मुक्त बनो। पिछले जन्मों के कर्मों के हिसाब-किताब वा वर्तमान पुरूषार्थ की कमजोरी के कारण किसी भी व्यर्थ स्वभाव-संस्कार के वश होने से मुक्त बनो। यदि कोई भी सेवा की, संगठन की, प्रकृति की परिस्थिति स्वस्थिति को वा श्रेष्ठ स्थिति को डगमग करती है - तो यह भी बन्धनमुक्त स्थिति नहीं है, इस बन्धन से भी मुक्त बनो। पुरानी दुनिया में पुराने अन्तिम शरीर में किसी भी प्रकार की व्याधि अपनी श्रेष्ठ स्थिति को हलचल में न लाये - इससे भी मुक्त बनो। व्याधि का आना, यह भावी है लेकिन स्थिति हिल जाना - यह बन्धनयुक्त की निशानी है। स्वचिन्तन, ज्ञान चिन्तन, शुभचिन्तक बनने का चिन्तन बदल शरीर की व्याधि का चिन्तन चलना - इससे मुक्त बनो - इसी को ही कर्मातीत स्थिति कहा जाता है।कर्मयोगी बन कर्म के बन्धन से सदा न्यारे और सदा बाप के प्यारे बनो - यही कर्मातीत विदेही स्थिति है। कर्मातीत का अर्थ यह नहीं है कि कर्म से अतीत हो जाओ। कर्म से न्यारे नहीं, कर्म के बन्धन में फँसने से न्यारे बनो। कोई कितना भी बड़ा कार्य हो लेकिन ऐसे लगे जैसे काम नहीं कर रहे हैं लेकिन खेल कर रहे हैं। चाहे कोई भी परिस्थिति आ जाए, चाहे कोई आत्मा हिसाब-किताब चुक्तू करने वाली सामना करने भी आती रहे, चाहे शरीर का कर्म-भोग सामना करने आता रहे लेकिन हद की कामना से मुक्त रहना ही विदेही स्थिति है। जब तक यह देह है, कर्मेन्द्रियों के साथ इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजा रहे हो, तब तक कर्म के बिना सेकण्ड भी रह नहीं सकते लेकिन कर्म करते हुए कर्म के बन्धन से परे रहना यही कर्मातीत विदेही अवस्था है। तो कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म के सम्बन्ध में आना है, कर्म के बन्धन में नहीं बंधना है। कर्म के विनाशी फल की इच्छा के वशीभूत नहीं होना है। कर्मातीत अर्थात् कर्म के वश होने वाला नहीं लेकिन मालिक बन, अथॉरिटी बन कर्मेन्द्रियों के सम्बन्ध में आये, विनाशी कामना से न्यारा हो कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म कराये। आत्मा मालिक को कर्म अपने अधीन न करे लेकिन अधिकारी बन कर्म कराता रहे। कराने वाला बन कर्म कराना - इसको कहेंगे कर्म के सम्बन्ध में आना। कर्मातीत आत्मा सम्बन्ध में आती है, बन्धन में नहीं।कर्मातीत अर्थात् देह, देह के सम्बन्ध, पदार्थ, लौकिक चाहे अलौकिक दोनों सम्बन्ध से, बन्धन से अतीत अर्थात् न्यारे। भल सम्बन्ध शब्द कहने में आता है - देह का सम्बन्ध, देह के सम्बन्धियों का सम्बन्ध, लेकिन देह में वा सम्बन्ध में अगर अधीनता है तो सम्बन्ध भी बन्धन बन जाता है। कर्मातीत अवस्था में कर्म सम्बन्ध और कर्म बन्धन के राज़ को जानने के कारण सदा हर बात में राज़ी रहेंगे। कभी नाराज़ नहीं होंगे। वे अपने पिछले कर्मों के हिसाब-किताब के बन्धन से भी मुक्त होंगे। चाहे पिछले कर्मों के हिसाब-किताब के फलस्वरूप तन का रोग हो, मन के संस्कार अन्य आत्माओं के संस्कारों से टक्कर भी खाते हों लेकिन कर्मातीत, कर्म-भोग के वश न होकर मालिक बन चुक्तू करायेंगे। कर्मयोगी बन कर्मभोग चुक्तू करना - यह है कर्मातीत बनने की निशानी। योग से कर्मभोग को मुस्कराते हुए सूली से कांटा कर भस्म करना अर्थात् कर्मभोग को समाप्त करना। कर्मयोग की स्थिति से कर्मभोग को परिवर्तन कर देना - यही कर्मातीत स्थिति है। व्यर्थ संकल्प ही कर्मबन्धन की सूक्ष्म रस्सियां हैं। कर्मातीत आत्मा बुराई में भी अच्छाई का अनुभव करती है। वह कहेगी - जो होता है वह अच्छा है, मैं भी अच्छा, बाप भी अच्छा, ड्रामा भी अच्छा। यह संकल्प बन्धन को काटने की कैंची का काम करता है। बन्धन कट गये तो कर्मातीत हो जायेंगे। विदेही स्थिति का अनुभव करने के लिए इच्छा मात्रम् अविद्या बनो। ऐसी हद की इच्छा मुक्त आत्मा सर्व की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली बाप समान 'कामधेनु' होगी। जैसे बाप के सर्व भण्डारे, सर्व खजाने सदा भरपूर हैं, अप्राप्ति का नाम निशान नहीं है; ऐसे बाप समान सदा और सर्व खजानों से भरपूर बनो। सृष्टि चक्र के अन्दर पार्ट बजाते हुए अनेक दु:ख के चक्करों से मुक्त रहना - यही जीवनमुक्त स्थिति है। ऐसी स्थिति का अनुभव करने के लिए अधिकारी बन, मालिक बन सर्व कर्मेन्द्रियों से कर्म कराने वाले बनो। कर्म में आओ फिर कर्म पूरा होते न्यारे हो जाओ - यही है विदेही स्थिति का अभ्यास।

 

वरदान:- मेरे को तेरे में परिवर्तन कर उड़ती कला का अनुभव करने वाले डबल लाइट भव

 

यह विनाशी तन और धन, पुराना मन मेरा नहीं, बाप को दे दिया। पहला संकल्प ही यह किया कि सब कुछ तेरा ..इसमें बाप का फ़ायदा नहीं, आपका फ़ायदा है क्योंकि मेरा कहने से फंसते हो और तेरा कहने से न्यारे हो जाते हो। मेरा कहने से बोझ वाले बन जाते और तेरा कहने से डबल लाइट, ट्रस्टी बन जाते। जब तक कोई हल्का नहीं बनते तब तक ऊंची स्थिति तक पहुंच नहीं सकते। हल्का रहने वाले ही उड़ती कला द्वारा आनंद की अनुभूति करते हैं। हल्का रहने में ही मजा है।

 

स्लोगन:- शक्तिशाली आत्मा वह है जिस पर कोई भी व्यक्ति वा प्रकृति अपना प्रभाव न डाल सके।

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