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दीदी मनमोहिनी जी की जीवन कहानी

Biography of Didi Manmohini ji (1915-1983) in Hindi. दीदी (बड़ी बहन) मनमोहिनी जी रूद्र ज्ञान यज्ञ के शुरुआती वर्षों में (1936-37) में ही यज्ञ (ब्रह्म कुमारी व ॐ मण्डली) में शामिल हो गईं। कैसे? यह भी आप यहाँ जानेंगे। उनका लौकिक नाम गोपी था।  उनका जन्म 1915 में सिंध, हैदराबाद (जो वर्त्तमान पाकिस्तान में) में माता रुक्मणी के घर हुआ।  दादा लेखराज (प्रजापिता ब्रह्मा बाबा) के साथ दीदी के लौकिक परिवार का पारिवारिक संबंध था।

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दीदी का जन्म एक साहूकार (धनवान) घर में हुआ और उनका विवाह भी ऐसे ही साहूकार घर में किया गया। तब भी उनका दादा लेखराज से पारिवारिक सम्बन्ध रहा। ऐसे ही एक दिन दीदी की माँ दादा के शरू किये गए सत्संग से जुडी, तो दीदी को भी बुलावा आया।  वैसे तो दीदी पेहले भी बहुत बारी दादा लेखराज के घर गयी थी, लेकिन ऐसे सतसंग के लिए नहीं। आज दीदी को पहली बार दादा को देख एक अजीब सी रूहानी आकर्षण हुई।  उनको दादा में श्री कृष्ण का साक्षत्कार हुआ।  जैसे दीदी ने स्वयं बताया - ''में जैसे पल भर के लिए स्वर्ग में पहुँच गयी. मुझे कृष्ण बहुत आकर्षित कर रहा था। उस दिन बाबा ने सत्संग में भगवद की गोपियों की बात की - कैसे वो एक के प्यार में मगन थी, तो मुझे अंदर से लगा की यह गोपी और कोई नहीं लेकिन में ही हूँ।''

दीदी का परिचय- वीडियो


मनमोहिनी दीदी जी की दिव्य विशेषताएं

  • बालक और मालिक का बैलेंस

दीदी यज्ञ की मालिक थी लेकिन उनके जीवन में बालक और मालिकपन का बैलेंस सभी ने देखा। जो यथार्थ बात होती वह मालिक बन सबके सामने रखती थीं लेकिन अगर सबकी एकमत नहीं होती तो बालक बन तुरंत उसे भूल जाती। कभी बहस डिबेट में समय नहीं गंवाती। दीदी बालक बन बाबा की अंगुली पकड़कर यज्ञ की हर डिपार्टमेंट का चक्कर लगाती। बाबा उन्हें कहते : "अभी आपने बाबा की अंगुली पकड़ी है, भविष्य में श्रीकृष्ण आपकी उंगली पकड़कर चलेगा। ऐसा नशा है ना!"


२८ जुलाई विशेष

दिदि जी विशेष आत्मा रही... गुणमूर्त बन सभी के गुण देखती थीं। उनका कहना था कि... विशेष आत्मा बन, विशेषता को ही देखो और विशेषता का ही वर्णन करो। आज हम यही अभ्यास करेंगे।

"मैं विशेष आत्मा हूं, शिव परमात्मा की प्यारी संतान हूं" --- सदा मोती चुनने वाली होली हंस हूं ---मैं सदा सबकी विशेषताएँ ही देखती हूं और उनका ही वर्णन करती हूं-- इससे मेरी विशेषता भी बढ़ जाती है और उस आत्मा को भी प्रेरणा मिलती है।दीदी जी कहती थीं कि अगर हम किसी की कमजोरी मन में रखेंगे तो वो हमारी कमजोरी बन जायेगी... तो हम किसी की कमजोरी देखे ही क्यों?... मैं आत्मा तो सर्व की विशेषता देखने वाली विशेष आत्मा हूँ... जब मैं आत्मा किसी की विशेषता देखती हूँ... तो वो मेरी भी विशेषता बन जाती हैं... और उस आत्मा को भी मुझ से पॉजिटिव एनर्जी मिलती हैं... और उनकी विशेषता और ही वृद्घि को पाती हैं।दीदी जी का कहना था कि सदा अपने श्रेष्ठ स्वमान मे रहो... मैं गुणमूर्त आत्मा हूँ... सम्बन्ध-सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा के गुण और विशेषता ही देखो... उनकी विशेषताओं का ही वर्णन करो... मैं बाप समान आत्मा... मास्टर प्रेम का सागर हूँ... हर आत्मा प्रति कल्याण की भावना लिए हुये... हर आत्मा की विशेषताओं को उजागर कर... उनका उमंग-उत्साह बढ़ाती हूँ।

दीदी जी कहती थीं सदा सोचो कि मैं सर्व की स्नेही आत्मा बन गई हूँ... समाने की शक्ति द्वारा... सर्व की कमी कमजोरियों का विनाश कर... उनके गुणों और विशेषताओं को देख उन्हें आगे बढ़ाने की निमित्त आत्मा हूँ... सभी के पुरुषार्थ को तीव्र करने वाली बाप समान आत्मा हूँ।दीदी जी की मान्यता थी कि... यदि विशेष आत्मा बनना है तो सबकी विशेषता देखो। दीदी जी की विशेषताओं का अनुसरण करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है।


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