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ब्रह्मचर्य और पवित्र जीवन

ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से संपर्क में आने वाले मनुस्यो को यह प्रश्न रेहता ही है - की 'पवित्रता' जो यहाँ का मुख्य विषय है, उसका यथार्त अर्थ क्या है? क्या सिर्फ शरीर से ब्रह्मचर्य में रहना है?


इस लेख में आप जानेंगे - पवित्रता का गुह्य अर्थ।


ब्रह्मचर्य, जीवन जीने का तरीका

दुनिया, ब्रह्मचर्य जीवन को एक कुमारी के रूप में समझती है। लेकिन यह केवल एक बाहरी जीवन शैली नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है।  अब हम ईश्वरीय ज्ञान के माध्यम से यह समझ गए है की ब्रह्मचर्य अर्थात मन में पवित्रता (विचारों में), मुख में शुद्धता (हमारे शब्दों में) और भौतिक शरीर की पवित्रता (ब्रह्मचर्य होने) में है। पवित्रता या ब्रह्मचर्य का विषय अति सूक्ष्म है। अतः यदि कोई समझने और पूरी तरह से धारण करने की इच्छा रखता है, तो एक शब्द में पवित्रता का अर्थ है 'संपूर्ण आत्म चेतना’।


राजयोग के अनुशासन में से पहला अनुशासन "ब्रह्मचर्य" का पालन है। ब्रह्माकुमारी व ब्रह्माकुमार जैसे ही आगे बढ़ते है, पवित्रता के मूल्य को समझते है और दुनिया में रहते हुए भी ब्रह्मचर्य जीवन को अपनाते है। ब्रह्मचर्य आत्मा को शुद्ध करने के लिए पहला कदम है। पवित्रता का व्रत, न केवल ब्रह्मचर्य का व्रत है, बल्कि यह हर विचार, वचन और कर्म में शुद्ध रहना है। कोई कह सकता है कि ब्रह्मचर्य स्वाभाविक रूप से आसान है। दूसरे कह सकते हैं, यह लगभग असंभव है। इस तरह से, जो लोग मानते हैं कि यह किसी तरह मुश्किल है, निश्चित रूप से वह भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर सकते हैं। क्योंकि यह न भूले कि खुद भगवान ने हमें पवित्रता का संदेश दिया है। इस गुण (पवित्रता का) के बिना, कोई भी परमात्मा पर ध्यान के एक दिव्य अवस्था में प्रवेश नहीं कर सकता, जो और कुछ नहीं बस उनकी याद है।



विचारों में पवित्रता

हम वह है जो हम सोचते है। क्योंकि वही मैं स्वयं हूँ। मैं क्या और कैसा सोचता हूँ, वैसा ही मैं हूँ । इस सरल अनुभूति के साथ,  हम सभी नकारात्मक विचारों को जीतने या मन को मुक्त करने और अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से ऐसा आध्यात्मिक पुरुषार्थ करते हैं। हम प्रयास कर और विचारों की दिशा को नियंत्रित कर सकते हैं। हाँ, निश्चित रूप से हम सोचना बंद नहीं कर सकते! लेकिन स्व-अनुभूति आत्मा को निर्देशित करता है, अपने मन और कर्मेन्द्रियों को वापस लेने के लिए। हम मन को मार्गदर्शन करेंगे कि कैसे सोचना है और कितना सोचना है। क्योंकि सकारात्मक सोच भी एक नियंत्रित तरीके से, एक स्वाभाविक तरीके से होनी चाहिए। विचारों में पवित्रता का विषय बहुत सूक्ष्म हैं। जब कोई संपूर्ण आत्म-चेतन अवस्था को प्राप्त करता है, जहाँ कोई अशुद्ध, कोई व्यर्थ विचार नहीं उभरता है, तभी यह 100% हो सकता है। यह अवस्था कई लोगों द्वारा राजयोग मैडिटेशन के नियमित और यथार्थ अभ्यास से प्राप्त की गयी है।



शब्दों में पवित्रता

यह निश्चित रूप से दिखता है और आसान है। फिर भी, कई लोग इसे बेहद मुश्किल पाते हैं। इसलिए यह समझा जाता है कि प्रत्येक आत्मा की एक अलग यात्रा है और इसलिए उनके विभिन्न प्रकार के संस्कार होते हैं (उनके कर्मों के आधार पर)। इसलिए, हम सभी दुनिया को अलग तरह से अनुभव करते हैं। जब शब्दों में पूर्ण दिव्यता होने की बात आती है, तो हम कहते हैं कि यह परिस्थिति पर निर्भर करता है। मगर, यह सवाल हमारा है। शब्द हमारी आंतरिक दुनिया, हमारी आंतरिक स्थिति को दर्शाता हैं। 'अगर मेरे भीतर की अवस्था दिव्य है, तो कोई भी बहार की बात, मुझे थोड़ा भी हिला नहीं सकती, लेकिन जब भीतर की दुनिया में हलचल हो, तो बाहर से थोड़ी ही बात हमें तोड़ने के लिए के लिए काफी होती है ’। कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण करने की शक्ति की आवश्यकता है।


मुरली में बाबा कहते हैं: “अपने मुंह में कुछ रखो ताकि वह तुम्हारी अवज्ञा न करें  ”। अर्थात जब कोई परिस्थिति आती है और आपको लगता है कि यह टकराव का कारण बन सकता है, तो बस अपना मुख बंद करें और मुसकुराए। बाहर जो चल रहा है उसे भूल जाए और शांति के सागर में (ईश्वर) में डूब जाए। इसको भगवान, हमारे रूहानी बाप के साथ सीधा सम्बन्ध कहा जाता है।

"मीठा बोलो, धीरे बोलो, कम बोलो"

- हमने इसको अपना स्लोगन बना दिया है और इसका हम अपने जीवन में अभ्यास करते है।



कर्म में पवित्रता

पवित्रता से लिया गया सबसे साधारण अर्थ ‘ब्रह्मचर्य’ माना जाता है,  जिसका अर्थ है - जीवन का तरीका जिसमें कोई विवाहित या यौन-क्रिया से मुक्त रहना है, काम वासना के वश से और भौतिक जगत से स्वयं को अलग करता है। सामान्य शब्दों में, जिसे हम भारत (इंडिया) में सन्यास कहते हैं (ईश्वर की खोज में भौतिक दुनिया और पारिवारिक संबंधों का त्याग)।


सूक्ष्म रूप में, पूर्ण ब्रह्मचर्य का अर्थ है अशुद्ध विचारों और दृष्टिकोण (वृत्ति) के संपर्क से बचना। बल्कि, यह शरीर के भान और उसके संबंधित 5 विकारों का त्याग है, न की संसार का। कर्म के बिना कोई रह नहीं सकता।

"वह आत्मा जो शरीर और शरीर के भान से खुद को अलग करती है, जो सदा अपने कर्मेन्द्रियों का मालिक है, जो दुनिया की सेवा में सभी गतिविधियों को करते हुए साक्षी रहता है, वह मनुष्यों में सबसे श्रेष्ठ है।’’ - अव्यक्त मुरली और श्रीमत गीता


संक्षिप्त में समझे, तो कोई ये निष्कर्ष निकाल सकता है की पवित्रता अन्य सभी गुणों की जननी है। मन, वचन और विचारों में संपूर्ण और स्वाभाविक पवित्रता की चाबी है, आत्म-चेतना। इस अभ्यास के लिए , हमने हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में स्वमान कमेंटरीज़ बनाई है। शुरुवात करने के लिए यह सबसे उपयोगी साधन है।

हिंदी स्वमान कमेंटरीज़

अंग्रेजी स्वमान कमेंटरीज़


यह भी कहा जाता है, "जैसा खाओगे, वैसा बन जाओगे" - जिसका अर्थ समझाया गया है: जो भोजन को हम अपने पेट में रखते है, उस भोजन के प्रकंपन को हम ग्रहण करते है। इस रीति से, उन प्रकम्पनों को ग्रहण करते, हम उसी प्रकम्पनों को अपनाते है। आध्यात्मिकता की हमारी यात्रा में शुद्ध (सात्विक) भोजन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां तक कि संत भी हमें यही बताते हैं। आध्यात्मिक जीवन शैली के लिए, भोजन जो प्रकृति माँ से प्राप्त होता है और जानवरों से नहीं (शाकाहारी भोजन), यह सबसे अच्छा माना जाता है। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारा लेख पढ़े: योगी का आहार


ब्रह्मचर्य का महत्व (Importance of Celibacy)- BK Sachin bhai


आत्म-चेतना - आनंदमय जीवन की चाबी है।

आत्म-चेतना क्या है?

जब हम जागरूकता की स्थिति में होते हैं कि "मैं एक आत्मा हूं और यह भौतिक शरीर नहीं है", तो हमारी शक्तियां असीमित होती हैं, क्योंकि आत्मा किसी चीज़ से सीमित नहीं है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति इस भान के साथ सोचता है, महसूस करता है, कार्य करता है, प्रतिक्रिया करता है, आदि.. कि वह (आत्मा को संदर्भ करता है) शरीर का मालिक है। आत्म-चेतना में आत्मा के मूल गुण (शांति, पवित्रता, प्रेम, आनंद) स्वाभाविक रूप से उभरते है। हम आत्मा शांति और खुशी के लिए बाहरी (भौतिक) चीजों पर निर्भर नहीं हैं। वे हमारा आंतरिक स्वभाव हैं। दुःख और अशांति अनुभव करने का कारण यह विकार है। इस प्रकार से, यह अब भगवान का संदेश है और यह जाग्रत होने का समय है। हम सभी भाई है, एक निराकार परमात्मा की संतान है।


आत्म-चेतना का अभ्यास (स्वमान-YouTube)


Refer to "Brahmacharya - Hindi eBook" (pdf): https://drive.google.com/file/d/1zhd-SLLy1aowLzdi6-RpOUIZp0l0WpVi/view


ओम शांति.

*Thought for Today*

'Will Power is the greatest asset of a human soul. Use your will power to benefit the self and the world. Practice.'

Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidhyalaya

 (Godly Spiritual University)

Established by God, this is the World Spiritual University for Purification of Souls with the knowledge and RajaYoga taught by the Supreme Soul (God), giving his most beneficial advice. 

Established in 1936, by today has more than 8500 centres in around 140 countries. World transformation is taking place. Come and know .more

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