• Shiv Baba

BK murli today in Hindi 29 June 2018 - aaj ki murli


Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - BapDada - Madhuban - 29-06-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन"

मीठे बच्चे - स्वीटेस्ट बाप आया है, स्वीट बनाने, तुम्हें देवताओं समान स्वीट बनना और बनाना है"

प्रश्नः- सदा सुखी बनने का वरदान किन बच्चों को प्राप्त होता है?

उत्तर:- जिन्हें ज्ञान रत्नों की वैल्यू है। एक-एक रत्न पद्मपति बनाने वाला है। तुम बच्चे इन रत्नों को धारण कर रूप बसन्त बनो। मुख से सदैव रत्न निकलते रहें तो सदा सुखी बन जायेंगे। जो बच्चे मीठा बनते हैं, उन्हें बाप भी देखकर खुश होते हैं और सदा सुखी बनने का वरदान देते हैं। तुम बच्चे इसी वरदान से एवरहेल्दी, एवरवेल्दी बन जाते हो।

गीत:-आ गये दिल में तू ...

ओम् शान्ति।कितना मीठा गीत है। भल बनाया फिल्म वालों ने है, परन्तु वे तो कुछ भी जानते नहीं। तुम मीठे बच्चे इस बेहद के नाटक में पार्ट बजा रहे हो। बेहद के ड्रामा में बेहद का बाप भी अब पार्ट बजा रहे हैं सम्मुख। तुम बच्चों को स्वीट बाबा ही नज़र आता है। आत्मा इन नयनों से (शरीर के आरगन्स से) एक-दो को देखती है। आत्मा भी जो सम्मुख बैठी है, वह जानती है, जिसके लिए बाबा कहते हैं स्वीट चिल्ड्रेन। बाबा कहते हैं मैं सब बच्चों को बहुत स्वीट बनाने आया हूँ। माया ने तुमको बहुत कड़ुआ बना दिया है। यह बाप ही आकर समझाते हैं, तुम कितने स्वीट थे। बरोबर तुम जब मन्दिरों में जाते हो तो देवताओं को कितना स्वीट समझते हो। देवताओं को कितनी मीठी नज़र से देखते हो। कहाँ मन्दिर खुले तो स्वीट देवताओं का दर्शन करें। बनावट तो भल पत्थर की है, परन्तु समझते हैं यह स्वीट होकर गये हैं। शिव के मन्दिर में जाते हैं, वो भी बहुत स्वीटेस्ट हैं। जरूर होकर गये हैं। स्वीटेस्ट ते स्वीटेस्ट, मीठे से मीठा बाप जरूर भारत में ही आया होगा। मन्दिरों में जो भी हैं वो सब होकर गये हैं। जरूर कुछ करके गये हैं। स्वीटेस्ट बाप को जानने वाले बच्चे ही होंगे। तो जरूर कहेंगे निराकार परमपिता परमात्मा सबसे स्वीटेस्ट है।भारत में खास, दुनिया में आम शिवबाबा की महिमा तो बहुत है। शिव काशी विश्व नाथ गंगा - ऐसे बहुत कहते हैं। वहाँ जाकर रहते भी हैं। यह बाबा भी सब तरफ चक्र लगाकर आये हैं। मनुष्य शिव की कितनी महिमा करते हैं! बाप जानते हैं यह सब स्वीट चिल्ड्रेन हैं। घर के बच्चे हैं। सबको नम्बरवार अपना पार्ट मिलता है, परन्तु सबकी नज़र हीरो-हीरोइन पर ही जायेगी। अब इस ड्रामा में जो हीरो-हीरोइन हैं उन्हों के लिए गाते हैं तुम मात-पिता....। अभी तुम बच्चे जानते हो उस मात-पिता के सम्मुख बैठे हैं। दुनिया के सम्मुख तो नहीं हैं। यह है गुप्त। इनका नाम-निशान बिल्कुल ही गुम कर दिया है। सिर्फ चित्र हैं परन्तु उनसे कोई पता नहीं पड़ता। शिव के पुजारी तो बहुत होते हैं। लेकिन पूरा परिचय नहीं है। तुम जानते हो शिवबाबा है स्वीटेस्ट, उन जैसा स्वीट कोई हो नहीं सकता। वह स्वीटेस्ट बाप न आये तो यह पतित दुनिया पावन कैसे बनें। इस समय तुम बच्चों के सिवाए कोई भी स्वीट नहीं है। भल अपने को शिवोहम्, भगवान कहते रहते हैं। लेकिन भगवान तो इतना स्वीटेस्ट है, वह तो परमधाम में रहने वाला है, तुम फिर इस पतित दुनिया में कैसे कहते हो - शिवोहम्, हम भगवान हैं! भगवान तो रचयिता, पतित-पावन है। भगवान को सभी भक्त याद करते हैं। ऐसे नहीं, सब भक्त भगवान हैं। निराकार शिव को ही स्वीटेस्ट कहेंगे। स्वीटेस्ट बाबा द्वारा ही स्वीटेस्ट स्वर्ग में जायेंगे। यह डिनायस्टी रची जा रही है। स्वीटेस्ट बाबा हमको मोस्ट बिलवेड स्वीट बना रहे हैं। जो जैसा होगा ऐसा बनायेगा ना। कहते हैं मैं निराकार हूँ। तुम आत्मायें भी निराकार हो। शिव के मन्दिर में शिवलिंग की पूजा होती है ना। यज्ञ रचते तो सालिग्राम और शिव बनाते हैं। उनकी पूजा करते हैं। बहुत बड़े-बड़े सेठ लोग यज्ञ रचते हैं। रुद्र शिव का भी लिंग बनाते हैं और सालिग्राम भी बनाते हैं। ब्राह्मण लोग पूजा करते हैं। तुम ब्राह्मण ही पूज्य थे फिर पुजारी बने हो। शिव का लिंग बड़ा, सालिग्राम छोटा बनाकर पूजा करते हैं। उसका नाम ही है रुद्र यज्ञ। तो यह हो गई मिट्टी की पूजा। बुत आदि मिट्टी के बनाते हैं यादगार के लिए। फिर पुजारी बैठ पूजा करते हैं। भारत पूज्य था। सतयुग-त्रेता में पुजारीपन नहीं था। आधा कल्प है ज्ञान, आधा कल्प है भक्ति। गाया भी जाता है आप-ही पूज्य और आप-ही पुजारी। फिर कहते हैं सब भगवान हैं। समझते हैं भगवान ही पूज्य था, भगवान ही पुजारी बनता है, इसको उल्टी गंगा कहा जाता है। बाप को तो सब बुलाते हैं - हे भगवान, हे पतित-पावन, हे रहमदिल, पुकारना माना आह्वान करना। भक्ति मार्ग में आधा कल्प भक्त लोग आह्वान करते हैं। स्वर्ग में तो तुम मालिक होंगे। बाप कहते हैं तुमको बहुत स्वीटेस्ट बना रहा हूँ। गॉड फादर कितना मीठा, कितना प्यारा शिव भोला भगवान है। शंकर का तो नाम ही नहीं डालेंगे। शिव निराकार, शंकर आकारी - दोनों को मिलाना तो ग़लत है ना। मनुष्य कोई के भी मन्दिर में जायेंगे तो पूजा एक ही निराकार की करेंगे। सबको मिला देते हैं। अचतम् केशवम्, श्री राम नारायणम्.... अब राम कहाँ, नारायण कहाँ। सबको इकट्ठा कर दिया है।व्यास कौन था - यह कोई भी नहीं जानते। वास्तव में सच्चे व्यास सुखदेव के तुम बच्चे हो। बाबा बैठ सहज योग की नॉलेज सुनाते हैं और उस सुखदेव के हम बच्चे हैं सच्चे-सच्चे व्यास। हम ब्राह्मण हैं। हमको प्रैक्टिकल में बैठ सहज राजयोग सिखलाते हैं, जिससे हम मनुष्य से देवता बनते हैं। देवताओं के आगे जाकर गाते हैं हम पापी, नीच, कड़ुवे हैं। वह तो बहुत मीठे हैं ना। इन लक्ष्मी-नारायण ने ही 84 जन्म लिए हैं। ततत्वम्। यह नॉलेज तुमको ही मिलती है। लक्ष्मी-नारायण में वहाँ यह नॉलेज नहीं होगी। हम वहाँ यह नॉलेज देकर किसी को देवता नहीं बनाते हैं। तो बाकी क्या काम करें? यहाँ तो कितने काम हैं। अभी हम स्वीटेस्ट बाबा के बच्चे हैं, फिर श्री लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। तुम जानते हो हम स्वीटेस्ट फादर से स्वीटेस्ट बनते हैं। शिवबाबा है श्री श्री मीठे ते मीठा। उनसे हम भी मीठे बनते हैं। हम अपने को श्री श्री नहीं कह सकते। यह समझने की बातें हैं। तुम जितना अशरीरी, देही-अभिमानी बनेंगे और मीठे बाप को याद करेंगे उतना मीठा बनेंगे। देही-अभिमानी बन बाप और वर्से को याद करना है। यह एक मुख्य बात न भूलो। मुझे याद करेंगे तो मेरे जैसा मीठा बन जायेंगे। तो ऐसा बनाने वाले बाप को कितना याद करना चाहिए। बाबा मिठास का तो जैसे एक पहाड़ है। कहते हैं ना - सिमर-सिमर सुख पाओ। कोई सिमरणी नहीं सिमरनी है। माला नहीं फेरनी है। सिर्फ याद करना है। कोई को भी यह पता नहीं है कि यह माला किसकी याद में बनी हुई है। सिर्फ राम-राम करते रहते, माला फेरते रहते हैं। अभी तुम समझते हो राम शिव बाबा के हम बच्चे हैं इसलिए सिमरण करते हो। माला फेरना तो पुजारीपन का चिन्ह है। हम बाबा को बहुत याद करते हैं। याद से ही हम एवरहेल्दी, निरोगी बन जाते हैं। बाबा बार-बार कहते हैं अपने को अशरीरी समझ मुझे याद करो तो बेड़ा पार है। बाकी कोई 10-20 भुजा या सूंढ़ वाला मनुष्य नहीं होता। न कोई छींकने से देवता निकल आयेंगे। यह बातें अब सुनते हैं तो समझते हैं यह सब क्या है! यह सब है भक्तिमार्ग की सामग्री। सतयुग में यह कुछ भी होगी नहीं। भक्ति आधा कल्प चलती है। ज्ञान कोई आधा कल्प नहीं चलता है। ज्ञान की प्रालब्ध आधा कल्प चलती है। ज्ञान से 21 जन्म का वर्सा मिलता है। तो जैसे वह भक्ति का वर्सा मिलता है। भक्ति पहले सतोप्रधान थी। फिर सतो, रजो, तमो हो जाती है। जैसे यह भी बाप से वर्सा मिलता है। तो फिर पहले सतोप्रधान, फिर सतो, रजो, तमो में आते हैं। ज्ञान का वर्सा भी सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो होता है। यह समझने की बातें हैं। पहले तो समझना है - हम आत्मा मोस्ट बिलवेड बाप के बच्चे हैं। बाप इस जिस्म में आये हैं। जिस्म बिगर मुरली कैसे सुना सकेंगे। निराकारी दुनिया तो है साइलेन्स वर्ल्ड फिर है मूवी, यह टाकी। तीन लोक हैं ना। एक-एक बात तुम नई सुनते हो। दुनिया में और कोई जान न सके। तुम जानते हो हम आत्मायें साइलेन्स वर्ल्ड से आती हैं। वहाँ की रहवासी हैं, इसलिए उनका नाम ब्रह्माण्ड रखा हुआ है। अण्डे मिसल आत्मायें रहती हैं। परन्तु ऐसे है थोड़ेही। अगर स्टार कहें तो स्टार की पूजा कैसे हो! फल, फूल, दूध आदि उन पर कैसे ठहर सके। नाम तो शिव ठीक है। ऐसे नहीं कि वह बाप बड़ा, हम आत्मायें छोटी हैं। परम माना परमधाम की रहने वाली आत्मा जो मोस्ट बिलवेड है।तुम जानते हो अब हमको बाबा की श्रीमत पर चलना है। बहुत मीठे ते मीठा बाबा आकर हमको मोस्ट स्वीट बनाते हैं। आत्मा स्वीट बनेंगी तो शरीर भी स्वीट मिलेगा। बाप कहते हैं सिर्फ बीज और झाड़ को याद करो। बीज बाप ऊपर में है। वह है वृक्षपति। यह है फाउण्डेशन। फिर इनसे और टाल टालियाँ निकलती हैं। दुनिया में कोई की बुद्धि में यह नहीं है। बाबा कहते हैं - लाडले बच्चे, निराकार बाप इस शरीर द्वारा बोलते हैं। तुम इन कानों से सुनते हो। आत्मा ही धारण करती है। ज्ञान सूर्य प्रगटा, अज्ञान अंधेर विनाश। अंधियारी रात होती है ना। मनुष्य समझते हैं इससे भी अजुन अंधियारा होगा। यह है ही घोर अंधियारा। मनुष्य यह नहीं जानते। अभी तुम रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त को जान गये हो। जिसके लिए सन्यासी कहते हैं बेअन्त है। ईश्वर तुम्हारी गत मत न्यारी है। तुम तो समझते हो ईश्वर ही आकर गति सद्गति करते हैं। तुम जानते हो श्रीमत से हम सो नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनेंगे। कितना भारी नशा है! एम ऑब्जेक्ट तो एक होती है ना। बैरिस्टर बनेंगे, परन्तु नम्बरवार तो बनेंगे ना इसलिए फालो फादर मदर। जानते हो मदर फादर पुरुषार्थ कर नम्बरवन में जाते हैं तो हम भी पुरुषार्थ करें। हम भी इतना स्वीटेस्ट बनें। बच्चे माँ-बाप के तख्त पर जीत पाते हैं ना। वह बड़े हो जायेंगे तो मात-पिता नीचे उतरेंगे। तो जैसे तुम मात-पिता के तख्त पर जीत पाते हो।तुम बच्चों को बहुत प्यारा, बहुत मीठा बनना है। तुम्हारे मुख से सदैव रत्न निकलने चाहिए। रूप बसन्त तुम हो। उन्होंने तो एक कहानी बैठ बनाई है। यह है ज्ञान रत्न। जवाहरात को तो बाबा अच्छी रीति जानते हैं। सबसे ऊंच जवाहरात का धन्धा गिना जाता है। यह भी ज्ञान रत्न हैं। एक-एक रत्न की धारणा होती है। इससे तुम अनगिनत पदमपति बनते हो। तुम्हारे महलों में कैसे सोने की ईटें, हीरे जवाहरात लगते हैं! बड़े सुखी रहेंगे। एवर हेल्दी, एवर वेल्दी बनेंगे। यह जैसे बाबा वरदान देते हैं। जितना मीठा बनेंगे, उतना बाप खुश होगा। स्कूल में टीचर स्टूडेण्ट को जानते हैं ना। यह तो बेहद का बाप-टीचर-सतगुरू है। अभी तुम बच्चे सामने बैठे हो तो मुरली भी ऐसी निकलती है। परन्तु फिर ज्ञानी तू आत्मा को बाबा यहाँ रहने नहीं देते। कहते हैं - जाओ, जाकर मनुष्य से देवता बनाने की सेवा करो। जो कड़ुवे ते कड़ुवे, प्लेगी बहुत रोगी हो गये हैं, उनको निरोगी बनाओ। अभी तो एवरेज आयु 40-45 वर्ष होगी। योगी की आयु बहुत बड़ी होती है। कृष्ण को महात्मा, योगेश्वर कहते हैं। उनका जब राज्य था तब एव-रेज आयु 150 वर्ष थी। अब रोगी बन गये हैं। हिसाब तो है ना। परन्तु मनुष्य जानते नहीं। बुद्धि रूपी बर्तन जो सोने का था, उसमें विष (जहर) भरने से यह हाल हो गया है। अब बाबा ज्ञान अमृत डाल सोने का बनाते हैं। अच्छा!मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप समान स्वीटेस्ट बनना है। मुख से कभी कड़ुवे वचन नहीं निकालने हैं, सदैव मीठा बोलना है।

2) बाप हमको जो अमूल्य ज्ञान रत्न दे रहे हैं, उनकी वैल्यू को समझ अच्छी रीति धारण करना है।

वरदान:- बैलेन्स द्वारा ब्लिसफुल जीवन का साक्षात्कार कराने वाले सर्व की ब्लैसिंग के पात्र भव l

बैलेन्स सबसे बड़ी कला है। याद और सेवा का बैलेन्स हो तो बाप की ब्लैसिंग मिलती रहेगी। हर बात के बैलेन्स से सहज ही नम्बरवन बन जायेंगे। बैलेन्स ही अनेक आत्माओं के आगे ब्लिसफुल जीवन का साक्षात्कार करायेगा। बैलेन्स को सदा स्मृति में रखते हुए सर्व प्राप्तियों का अनुभव करते रहो तो स्वयं भी आगे बढ़ते रहेंगे और अन्य आत्माओं को भी आगे बढ़ायेंगे।

स्लोगन:- महावीर वह है जो हर मुश्किल को सहज कर, पहाड़ को राई व रुई बना दे।

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*Thought for Today*

'Every soul is unique in virtues and is pure at its original nature. God, the father of all souls reminds us'.

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