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BK murli today in Hindi 21 07 2018 - Aaj ki Murli


Brahma Kumaris murli today in Hindi - Aaj ki Murli - BapDada - Madhuban - 21-07-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन''

मीठे बच्चे - आप मुये मर गई दुनिया, बाप का बनना अर्थात् देह-अभिमान टूटना, एक बाप के सिवाए और कुछ भी याद न आये''

प्रश्न: अन्त का समय समीप देखते हुए कौन-सा स्लोगन सदा याद रखना है?

उत्तर:''किनकी दबी रहेगी धूल में, किनकी राजा खाए........'' - यह स्लोगन सदा याद रखो क्योंकि अभी दु:ख के पहाड़ गिरने हैं, सबका मौत होना है। तुम बच्चे तो अभी बाप पर पूरा बलि चढ़ते हो, तुम्हारा सब-कुछ सफल हो रहा है। तुम एक जन्म बलि चढ़ते, बाप 21 जन्मों के लिए बलिहार जाता है। 21 जन्म तुम्हें लौकिक माँ-बाप के वर्से की दरकार नहीं। द्वापर से फिर जैसा कर्म वैसा फल मिलता है।

गीत:- मैं एक नन्हा सा बच्चा हूँ.....

ओम् शान्ति।यह तो मनुष्य मात्र जानते हैं कि ऊंच ते ऊंच भगवान् है। भगवान् को हमेशा परमपिता परमात्मा कहते हैं और उनका ऊंचा नाम भी है, ऊंचा ठांव भी है। सबसे ऊंच मूलवतन में रहते हैं। अब जबकि गॉड फादर कहते हैं तो जरूर बच्चे ही ठहरे। ऐसे तो नहीं कह सकते हम फादर हैं। सर्वव्यापी कहने से तो सब फादर हो जाते। उनको तो हमेशा परे ते परे परमधाम में रहने वाला परमपिता परमात्मा कहा जाता है। ऊंच ते ऊंच भगवत, इसलिए सब भक्त उनको याद करते हैं। कहते भी हैं - भगवान् को ही भक्तों को भक्ति का फल देने यहाँ आना पड़ेगा। वह बाप है स्वर्ग का रचयिता। क्रियेटर जरूर नई दुनिया ही रचेंगे। तो वह आयेगा कहाँ? क्या पतित दुनिया में वा पावन दुनिया में? देखो, यह बात अच्छी रीति धारण करने की है। तुम कोई छोटे नहीं हो। शरीर के आरगन्स तो बड़े हैं ना। तुम जानते हो सभी बाप को याद करते हैं, समझते हैं यहाँ दु:ख है। हमको ऐसी जगह ले चलो, जहाँ शान्ति-सुख हो। ड्रामा अनुसार बाप को आना ही है। बनी बनाई बन रही.... इसमें कोई फ़र्क नहीं हो सकता। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी चक्र लगाती रहती है। 4 युग फिरते रहते हैं। कलियुग के बाद होता है संगमयुग, कलियुग और सतयुग के बीच का यह है कल्याणकारी धर्माऊ युग। यह है पुरुषोत्तम युग अर्थात् उत्तम ते उत्तम, मर्यादा पुरुषोत्तम बनने का युग। इस युग जैसा उत्तम युग कोई होता नहीं। सतयुग-त्रेता का संगमयुग कोई ऊंच नहीं है। उसमें तो दो कला सुख की कम होती हैं। इस संगमयुग की ही महिमा है। तुम जानते हो बाप तो है ऊंच ते ऊंच। ऐसे नहीं कि सर्वव्यापी है। बच्चे कितनी भूल करते हैं परन्तु भूल भी ड्रामा अनुसार होनी ही है। मैं फिर आकर अभुल बनाता हूँ। बाप कहते है मुझे तुम ऊंच ते ऊंच भगवत कहते हो मैं फिर तुम बच्चों को अपने से भी ऊंच बनाता हूँ, तब तो भक्त याद करते हैं। लेकिन सर्वव्यापी कहने से मिट्टी में मिला दिया है। तो खुद भी ऐसे कंगाल दु:खी हो गये हैं। भारत सुखधाम था। अब दु:खधाम है। अब बाप कहते हैं मैं तुमको अपने से भी ऊंच बनाता हूँ। मैं तो परमधाम ब्रह्माण्ड में रहता हूँ। तुम भी वहाँ रहते हो फिर यहाँ आते हो पार्ट बजाने। जानते हो ब्राह्मण हैं ऊंचे ते ऊंच चोटी। तो ऊंचे ते ऊंच शिवबाबा की क्या निशानी रखेंगे? वह तो एक स्टॉर है। जैसे आत्मा वैसे परमात्मा। चमकता है भ्रकुटी के बीच में अज़ब सितारा। आत्मा का रूप है ही स्टार। यह बना-बनाया ड्रामा है। इसमें सभी आत्मायें ब्रह्माण्ड, निराकारी झाड़ में रहती हैं जिसको निर्वाणधाम कहा जाता है। आत्मायें निराकारी दुनिया स्वीटहोम से आती हैं। अभी तो दु:खधाम है। कितने पार्टीशन हैं! सतयुग में कोई पार्टीशन नहीं था। भारत ही ऊंच खण्ड था। बाबा को सत्य (ट्रूथ) कहा जाता है। बाबा कहते हैं मैं सचखण्ड स्थापन करने आता हूँ तो जरूर नई दुनिया स्थापन कर, पुरानी दुनिया को मिटाना पड़े ना। अभी दु:ख के तो पहाड़ गिरने वाले हैं। किनकी दबी रहेगी धूल में....। वह भी समझते हैं कि हम जो बाम्ब्स बनाए आपस में आंख दिखाते हैं तो आखिर ख़ात्मा तो जरूर होना है। परन्तु पता नहीं कौन प्रेरक है जो ऐसी चीज़ बनवा रहे हैं। गीता में भी है कि पेट से मूसल निकले। यह है सारी बुद्धि की बातें। बाम्ब्स निकालते हैं अपने नेशन का विनाश करने। यादव, कौरव, पाण्डव - तीन सेनायें हैं ना। यादव-कौरव लड़कर खत्म हुए। बाकी कौरव-पाण्डवों की कोई लड़ाई नहीं होती। तुम्हारी कोई से युद्ध नहीं। तुम हो योगबल वाले राजऋषि। सन्यासी हैं हठयोग ऋषि। वह शंकराचार्य, यह शिवाचार्य। कृष्ण आचार्य नहीं कहेंगे। वह अब नॉलेज ले रहा है फिर सो श्रीकृष्ण बनने के लिए। यह राजधानी स्थापन हो रही है। तुम पतित कांटों से दैवी फूल बन रहे हो।गीत में भी सुना - आओ, अजामिल जैसे पापियों का उद्धार करो। गाया भी जाता है पतित पावन, वही सतगुरू है। जो तुमको नर से नारायण, राजाओं का राजा बनाते हैं। यह है एम आब्जेक्ट। यह पाठशाला है ना। इसमें हम नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनते हैं। इसमें अन्धश्रधा की बात नहीं। स्कूलों में एम आब्जेक्ट होती है ना। तुम बाप के पास आये हो बेहद का वर्सा लेने। वहाँ का वर्सा यहाँ लेना होता है। वह है ही सुखधाम। यह है दु:खधाम। गीत में सुना - मैं छोटा-सा बच्चा हूँ....। तुम बच्चे हो ना। कोई 25 वर्ष का, कोई 20 वर्ष का। बाबा कहते है - एक दिन का बच्चा भी वर्सा ले सकता है। बेहद का बाप फिर भारत को हीरे जैसा बनाने आया है। सतयुग में कितने हीरों-जवाहरों के महल थे! बात मत पूछो! फिर जब भक्ति मार्ग शुरू होता है तो पतित राजायें बैठ सोमनाथ जैसा मन्दिर बनाते हैं। राजाओं के पास मन्दिर होते हैं। आजकल तो बहुत ही मन्दिर बनाते रहते है। सबसे मुख्य मन्दिर किसने बनाया होगा! जो पूज्य से पुजारी बनते हैं जरूर उन्होंने ही बनाया होगा। आप ही पूज्य आप ही पुजारी - यह महिमा परमपिता परमात्मा की नहीं है। उनकी महिमा तो सबसे न्यारी है। हर एक मनुष्य की महिमा अलग होती है। ऊंचे ते ऊंच महिमा है बाप की, जिससे तुम 21 जन्मों का वर्सा पाते हो। फिर द्वापर से लेकर तुम लौकिक बाप का बच्चा बन जैसे-जैसे कर्म करते हो ऐसा जन्म लेते हो। धन दान करने से एक जन्म अल्पकाल सुख का वर्सा मिल जाता है। राजायें भी तो रोगी बनते हैं ना। स्वर्ग में तुम रोगी नहीं बनते हो। तुम्हारी एवरेज 150 वर्ष आयु रहती है। कितने हेल्दी रहते हो। बीमारी, दु:ख आदि का नाम नहीं। शिवबाबा बच्चों के लिए सौगात ले आते हैं, इसको हथेली पर बहिश्त कहा जाता है। पुरुषार्थ करना चाहिए - चाहे सूर्यवंशी बनो, चाहे चन्द्रवंशी बनो, चाहे साहूकार प्रजा। एम आब्जेक्ट तो है - कृष्ण जैसा बनना। बाकी कृष्ण वाच तो कभी हुआ नहीं है। यह है भगवानुवाच। समझाया जाता है - यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। राजस्व अर्थात् स्वराज्य प्राप्त करने के लिए। शास्त्रों में तो बड़ी कहानी लिख दी है। बाप पर बलि चढ़ने से बाप फिर 21 जन्म बलि चढ़ते है। बाप तुम बच्चों को ऊंचे ते ऊंच बनाते हैं। ब्रह्माण्ड में रहने वाले, ब्रह्माण्ड के मालिक ठहरे ना। फिर तुम विश्व के मालिक बनते हो, मैं विश्व का मालिक नहीं बनता हूँ। तुमको बनाने के लिए आता हूँ।तुम कहते भी हो - पतित-पावन आओ, आकर पावन बनाओ। फिर सर्वव्यापी कैसे ठहरा? सद्गति दाता पतित-पावन तो एक ही बाप है। इस समय सभी तमोप्रधान बन गये हैं। सतो-रजो-तमो से सबको पास करना ही है। हर चीज़ पहले सतोप्रधान होती है फिर तमोप्रधान बनती है। सतयुग में भी देवी-देवतायें सतोप्रधान फिर त्रेता में सतो; राम राज्य; क्षत्रिय, फिर रजो में वैश्य, तमो में शूद्र, वर्ण भी हैं ना। विराट रूप में देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र दिखाते हैं। बाप और ब्राह्मण गुम कर देते हैं। तुम ब्राह्मण देवताओं से भी ऊंच हो क्योंकि तुम भारत की ऊंच सेवा करते हो। तुम हो श्रीमत पर। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ, ऊंच ते ऊंच भगवान् की मत मिलती है जिससे तुम भी श्री लक्ष्मी-नारायण बनते हो, श्री श्री शिवबाबा द्वारा। फिर माया का प्रवेश होता है तो तुम आसुरी बन पड़ते हो। कल्प-कल्प बाबा ऐसे आकर समझाते हैं। बाबा ने ज्ञान का कलष तुम माताओं पर रखा है - मनुष्य से देवता बनाने। सन्यासी तो माताओं को नर्क का द्वार समझते हैं, निंदा करते हैं फिर आकर उन्हीं माताओं से भीख मांगते है, तो फिर कर्जा चढ़ जाता है इसलिए पुनर्जन्म फिर भी गृहस्थियों पास ले फिर सन्यास करते है। पुनर्जन्म नहीं लेते तो फिर इतने ढेर सन्यासी कहाँ से आते?भारत पवित्र था, सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया कहा जाता है। बरोबर देवताओं के आगे महिमा गाते हैं - आप सर्वगुण सम्पन्न........ फिर अपने को कहते है - मैं निर्गुण हारे में कोई गुण नाहीं। सर्वगुण सम्पन्न - यह शिवबाबा की महिमा नहीं है, यह देवताओं की महिमा है। परन्तु पूरा ज्ञान न होने कारण राम-सीता के आगे भी यह महिमा कर देते। शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। तो बाप कहते हैं - तुम्हारा अब ज्ञान का तीसरा नेत्र खुलता है। देवताओं को तीसरा नेत्र होता नहीं। चित्रों में देवताओं को दिखाते हैं परन्तु वास्तव में है तुम्हारा। परन्तु तीसरा नेत्र खुला फिर बन्द भी हो जाता है। आश्चर्यवत सुनन्ती, पशन्ती, औरों को सुनावन्ती फिर भी भागन्ती हो जाते हैं। बहुत अच्छे-अच्छे बच्चे माया से हारते हैं। बाप युद्ध कराते हैं 5 विकारों पर जीत पहनाने लिए। बाकी और युद्ध तो है नहीं। तुम अभी हो ब्रह्मा वंशी, फिर देवता बनेंगे। अभी शूद्र से ब्राह्मण वर्ण में आये हो। इस समय सृष्टि का चक्र पूरा बुद्धि में है। नाटक पूरा होता है। बाप ले चलने लिए आये हैं। माया ने सबको पतित बनाया है। अब बाप कहते है - योग अग्नि से तुम विकर्माजीत बनो, इसमें मेहनत है। और कुछ करना नहीं है, बाप को याद करना है। बाबा हम आपके थे। आपने हमको फिर सतयुग में भेजा, पुनर्जन्म सतयुग में लेते रहे। फिर त्रेता में आये तो पुनर्जन्म त्रेता में लिये। इसको भी बाप कहते हैं - तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो, हम बताते हैं। मनुष्य 84 जन्म कैसे लेते है? 84 लाख की तो बात ही नहीं हो सकती। कल्प की आयु ही 5 हजार वर्ष है। इन शास्त्रों ने तुम्हें घोर नींद में सुला दिया था। अब बाप ने तुमको जगाया है। तुम जागकर बाप से वर्सा ले रहे हो। तुम छोटे बच्चे हो, कोई 3 मास का, कोई 4 मास का। तुम ईश्वर के बनते हो तो फिर आप मुये मर गई दुनिया। बाबा का बनते हो तो देह-अभिमान टूट जाता है। बाप कहते है - शरीर में रहते हुए, गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान रहना है। सतयुग में तुम पवित्र सम्बन्ध में थे। अब अपवित्र गृहस्थ धर्म वाले बने हो। तुम देवी-देवता धर्म वाले ही 84 जन्म लेते हो। भक्ति भी तुम शुरू करते हो। पूज्य से पुजारी तुम बनते हो। पहले तुमने अव्यभिचारी भक्ति की, अब भक्ति भी व्यभिचारी बन पड़ी है। फिर तुमको बाप से वर्सा मिलता है। बाप को आना भी संगमयुग पर होता है। युगे-युगे कहने से करके 4 युग कहो ना। फिर 24 अवतार - कच्छ-मच्छ अवतार कैसे हो सकेंगे? गॉड इज वन, रचयिता भी एक है तो उनकी रचना भी एक है। अच्छा!मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) स्वराज्य के लिए बाप पर बलि चढ़ना है। एम-ऑब्जेक्ट सदा सामने रखनी है। पुरुषार्थ कर सूर्यवंशी बनना है।

2) बाप से जो ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, वह सदा खुला रहे। माया की प्रवेशता न हो जाए इसका पूरा ध्यान रखना है। योग अग्नि से विकर्माजीत बनना है।

वरदान: संकल्प शक्ति द्वारा हर कार्य में सफल होने की सिद्धि प्राप्त करने वाले सफलतामूर्त भव!

संकल्प शक्ति द्वारा बहुत से कार्य सहज सफल होने की सिद्धि का अनुभव होता है। जैसे स्थूल आकाश में भिन्न-भिन्न सितारे देखते हो ऐसे विश्व के वायुमण्डल के आकाश में चारों ओर सफलता के चमकते हुए सितारे तब दिखाई देंगे जब आपके संकल्प श्रेष्ठ और शक्तिशाली होंगे, सदा एक बाप के अन्त में खोये रहेंगे, आपके यह रूहानी नयन, रूहानी मूर्त दिव्य दर्पण बनेंगे। ऐसे दिव्य दर्पण ही अनेक आत्माओं को आत्मिक स्वरूप का अनुभव कराने वाले सफलतामूर्त होते हैं।

स्लोगन: निरन्तर ईश्वरीय सुखों का अनुभव करने वाले ही बेफिक्र बादशाह हैं।

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*Thought for Today*

'Every soul is unique in virtues and is pure at its original nature. God, the father of all souls reminds us'.

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