• Shiv Baba

BK murli today in Hindi 15 July 2018 - Aaj ki Murli


Brahma Kumaris murli today in Hindi - BapDada - Madhuban - 15-07-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 21-12-83 मधुबन

तुरत दान महापुण्य का रहस्य

आज विधाता, वरदाता बाप अपने चारों ओर के अति स्नेही सेवाधारी बच्चों को देख रहे थे। चारों ओर के समर्थ बच्चे अपने स्नेह की विशेषता द्वारा दूर होते भी समीप हैं। स्नेह के सम्बन्ध द्वारा, बुद्धि की स्पष्टता और स्वच्छता द्वारा समीप का, सन्मुख का अनुभव कर रहे हैं। तीसरे नेत्र अर्थात् दिव्यता के द्वारा उन्हों के नयन बुद्धि रूपी टी.वी. में दूर के दृश्य स्पष्ट अनुभव कर रहे हैं। जैसे इस विनाशी दुनिया के विनाशी साधन टी.वी. में विशेष प्रोग्राम्स के समय सब स्विच आन कर देते हैं। ऐसे बच्चे भी विशेष समय पर स्मृति का स्विच आन कर बैठे हैं। सभी दूरदर्शन द्वारा दूर के दृष्य को समीप अनुभव करने वाले बच्चों को बाप-दादा देख-देख हर्षित हो रहे हैं। एक ही समय पर डबल सभा को देख रहे हैं।आज विशेष वतन में ब्रह्मा बाप बच्चों को याद कर रहे थे क्योंकि सभी बच्चे जब से जो ब्राह्मण जीवन में चल रहे हैं उन ब्राह्मणों की, समय प्रमाण मंजिल अर्थात् सम्पूर्णता की स्थिति तक किस गति से चले रहे हैं, वह रिजल्ट देख रहे थे। चल तो सब रहे हैं लेकिन गति (स्पीड) क्या है? तो क्या देखा! गति में सदैव एक रफ्तार तीव्र हो अर्थात् सदा तीव्रगति हो, ऐसे कोई में भी कोई देखे। ब्रह्मा बाप ने गति को देख बच्चों की तरफ से प्रश्न किया कि नॉलेजफुल होते अर्थात् तीनों कालों को जानते हुए, पुरुषार्थ और परिणाम को जानते हुए, विधि और सिद्धि को जानते हुए, फिर भी सदाकाल की तीव्रगति क्यों नहीं बना सकते! क्या उत्तर दिया होगा? कारण को भी जानते हो, निवारण की विधि को भी जानते हो फिर भी कारण को निवारण में बदल नहीं सकते!बाप ने मुस्कराते हुए ब्रह्मा बाप से बोला कि बहुत बच्चों की एक आदत बहुत पुरानी और पक्की है - वह कौन सी? क्या करते! बाप प्रत्यक्ष फल अर्थात् ताज़ा फल खाने को देते हैं लेकिन आदत से मजबूर उस ताज़े फल को भी सूखा बना करके स्वीकार करते हैं। कर लेंगे, हो जायेंगे, होना तो जरूर है, बनना तो पहला नम्बर ही है, आना तो माला में ही है - ऐसे सोचते-सोचते प्लैन बनाते-बनाते प्रत्यक्ष फल को भविष्य का फल बना देते हैं। करेंगे, माना भविष्य फल। सोचा, किया और प्रत्यक्ष फल खाया। चाहे स्व के प्रति, चाहे सेवा के प्रति प्रत्यक्ष फल वा सेवा का ताज़ा मेवा कम खाते हैं। शक्ति किससे आती है - ताजे फल से वा सूखे से? कईयों की आदत होती है - खा लेंगे - ऐसे करते ताजे को सूखा फल बना देते हैं। ऐसे ही यहाँ भी कहते यह होगा तो फिर करेंगे, यह ज्यादा सोचते हैं। सोचा, डायरेक्शन मिला और किया। यह न करने से डायरेक्शन को भी ताजे से सूखा बना देते हैं। फिर सोचते हैं कि किया तो डायरेक्शन प्रमाण लेकिन रिजल्ट इतनी नहीं निकली। क्यों? समय पड़ने से वेला के प्रमाण रेखा बदल जाती है। कोई भी भाग्य की रेखा वेला के प्रमाण ही सुनाते वा बनाते हैं। इस कारण वेला बदलने से वायुमण्डल, वृत्ति, वायब्रेशन सब बदल जाता है इसलिए गाया हुआ है ''तुरत दान महापुण्य''। डायरेक्शन मिला और उसी वेला में उसी उमंग से किया। ऐसी सेवा का ताजा मेवा मिलता है, जिसको स्वीकार करने अर्थात् प्राप्त करने से शक्तिशाली आत्मा बन स्वत: ही तीव्रगति में चलते रहते। सभी फल खाते हो लेकिन कौन सा फल खाते हो, यह चेक करो।ब्रह्मा बाप सभी बच्चों को ताज़े फल द्वारा शक्तिशाली आत्मा बनाए सदा तीव्रगति से चलने का संकल्प देते हैं। सदा ब्रह्मा बाप के इस संकल्प को स्मृति में रखते हुए हर समय हर कर्म का श्रेष्ठ और ताजा फल खाते रहो। तो कभी भी किसी भी प्रकार की कमजोरी वा व्याधि आ नहीं सकती है। ब्रह्मा बाप मुस्करा रहे थे। जैसे वर्तमान समय के विनाशी डाक्टर्स भी क्या राय देते हैं! सब ताजा खाओ। जला करके, भून करके नहीं खाओ। रूप बदलकर नहीं खाओ। ऐसे कहते हैं ना। तो ब्रह्मा बाप भी बच्चों को कह रहे थे जो भी श्रीमत समय प्रमाण जिस रूप से मिलती है, उसी समय पर उस रूप से प्रैक्टिकल में लाओ तो सदा ही ब्रह्मा बाप समान तुरत दानी महापुण्य आत्मा बन नम्बरवन में आ जायेंगे। ब्रहृमा बाप और जगत अम्बा फर्स्ट राज्य अधिकारी, दोनों आत्माओं की विशेषता क्या देखी? सोचा और किया। यह नहीं सोचा कि यह करके पीछे यह करेंगे। यही विशेषता थी। तो फालो मदर फादर करने वाले महापुण्य आत्मा, पुण्य का श्रेष्ठ फल खा रहे हैं और सदा शक्तिशाली हैं। स्वप्न में भी संकल्प मात्र भी कमजोरी नहीं। ऐसे सदा तीव्रगति से चल रहे हैं लेकिन कोई में भी कोई।ब्रह्मा बाप को साकार सृष्टि के रचयिता होने के कारण, साकार रूप में पालना का पार्ट बाजाने के कारण, साकार रूप में पार्ट बजाने वाले बच्चों से विशेष स्नेह हैं। जिससे विशेष स्नेह होता है उसकी कमजोरी सो अपनी कमजोरी लगती है। ब्रह्मा बाप को बच्चों की इस कमजोरी का कारण देख स्नेह आता है कि अभी सदा के शक्तिशाली, सदा के तीव्र पुरुषार्थी सदा उड़ती कला वाले बन जाएं। बार-बार की मेहनत से छूट जाएं।सुना ब्रह्मा बाप की बातें। ब्रह्मा बाप के नयनों में बच्चे ही समाये हुए हैं। ब्रह्मा की विशेष भाषा का मालूम है, क्या बोलते हैं? बार-बार यही कहते हैं ''मेरे बच्चे, मेरे बच्चे।'' बाप मुस्कराते हैं। हैं भी ब्रह्मा के ही बच्चे, इसलिए अपने सरनेम में भी ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी कहते हो ना। शिवकुमार-शिवकुमारी तो नहीं कहते हो। साथ भी ब्रह्मा को ही चलना है। भिन्न-भिन्न नाम रूप से ज्यादा समय साथ तो ब्रह्मा बाप का ही रहता है ना। ब्रह्मा मुख वंशावली हो। बाप तो साथ है ही। फिर भी साकार में ब्रह्मा का ही पार्ट है। अच्छा और रूह-रूहान फिर सुनायेंगे।इस ग्रुप में तीन तरफ की विशेष नदियाँ आई हैं। डबल विदेशी तो अभी गुप्त गंगा है क्योंकि टर्न में नहीं हैं। अभी देहली, कर्नाटक और महाराष्ट्र इन तीन नदियों का मिलन विशेष है। बाकी साथ-साथ चूंगे में हैं। जो टर्न में आये हैं वह तो अपना हक लेंगे ही लेकिन डबल विदेशी भी भाग-भाग करके अपना हक पहले लेने पहुँच गये हैं। तो वह भी प्यारे होंगे ना। डबल विदेशियों को भी चूंगे में माल मिल रहा है। फिर अपने टर्न में मिलेगा। हर तरफ के बच्चे बापदादा को प्यारे हैं क्योंकि हर तरफ की अपनी-अपनी विशेषता है। देहली है सेवा का बीज स्थान और कर्नाटक तथा महाराष्ट्र है वृक्ष का विस्तार। जैसे बीज नीचे होता है और वृक्ष का विस्तार ज्यादा होता है तो देहली बीज रूप बनी। अन्त में फिर बीजरूप धरनी पर ही आवाज होना है। लेकिन अभी कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात तीनों का विशेष विस्तार है। विस्तार वृक्ष की शोभा होती है। कर्नाटक और महाराष्ट्र सेवा के विस्तार से ब्राह्मण वृक्ष की शोभा है। वृक्ष सज रहा है ना। प्रश्न भी यह दो ही पूछते हैं ना। एक तो खर्चे की बात पूछते, दूसरा ब्राह्मणों की संख्या का पूछते हैं। तो महाराष्ट्र और कर्नाटक दोनों ही संख्या के हिसाब से ब्राह्मण परिवार का श्रृंगार है। बीज की विशेषता अपनी है। बीज नहीं होता तो वृक्ष भी नहीं निकलता। लेकिन बीज अभी थोड़ा गुप्त है। वृक्ष का विस्तार ज्यादा है। अगर देहली में भी आप सब नहीं जाते तो सेवा का फाउन्डेशन नहीं होता। पहला निमंत्रण सेवा का लिया या मिला। लेकिन देहली से ही शुरू हुआ इसलिए सेवा का स्थान भी वो ही बना और राज्य का स्थान भी वो ही बनेगा। जहाँ पहले ब्राह्मणों के पांव पड़े तीर्थ स्थान भी वही बना और राज्य स्थान भी वही बनेगा। विदेश की भी बहुत महिमा है। विदेश से भी विशेष प्रत्यक्षता के नगाड़े देश तक आयेंगे। विदेश नहीं होता तो देश में प्रत्यक्षता कैसे होती इसलिए विदेश का भी महत्व है। विदेश की आवाज को सुन भारत वाले जगेंगे। प्रत्यक्षता का आवाज निकलने का स्थान तो विदेश ही हुआ ना। तो यह है विदेश का महत्व। विदेश में रहने वाले भी हैं तो देश के ही, लेकिन निमित्त मात्र विदेश में रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को उमंग-उत्साह में देख देश वालों में भी उमंग-उत्साह और ज्यादा होता है। यह भी उन्हों की गुप्त सेवा का पार्ट है। तो सभी की विशेषता अपनी हुई ना। अच्छा-सदा तुरत दान महापुण्य आत्माएं, सोचने और करने में सदा तीव्र पुरुषार्थी, हर संकल्प, हर सेकण्ड सेवा का मेवा खाने वाले, ऐसे सदा शक्तिशाली फालो फादर और फालो मदर करने वाले, सदा ब्रह्मा बाप के संकल्प को साकार में लाने वाले ऐसे देश-विदेश चारों ओर के समर्थ बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।सेवाधारियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात:जो सेवा करता वह मेवा खाता। मेवा खाने वाले सदा तन्दरूस्त रहते हैं। सूखा मेवा खाने वाले नहीं, ताज़ा मेवा खाने वाले। सेवाधारी सो भाग्य अधिकारी। कितना बड़ा भाग्य है। यादगार चित्रों के पास जाकर भक्त लोग सेवा करते हैं। उस सेवा को महापुण्य समझते हैं। और आप कहाँ सेवा करते हो! चैतन्य महातीर्थ पर। वे सिर्फ तीर्थों पर जाकर चक्कर लगाकर आते तो भी महान् आत्मा गाये जाते। आप तो महान् तीर्थ पर सेवा कर महान् भाग्यशाली बन गये। सेवा में तत्पर रहने वाले के पास माया आ नहीं सकती। सेवाधारी माना मन से भी सेवाधारी, तन से भी सेवा में बिजी रहने वाले। तन के साथ मन भी बिजी रहे तो माया नहीं आयेगी। तन से स्थूल सेवा करो और मन से वातावरण, वायुमण्डल को शक्तिशाली बनाने की सेवा करो। डबल सेवा करो, सिंगल नहीं। जो डबल सेवाधारी होगा उसको प्राप्ति भी इतनी होगी। मन का भी लाभ, तन का भी लाभ, धन तो अकीचार (अथाह) मिलना ही है। इस समय भी सच्चे सेवाधारी कभी भूखे नहीं रह सकते। दो रोटी जरूर मिलेंगी। तो सभी ने सेवा की लाटरी में अपना नम्बर ले लिया। जहाँ भी जाओ, जब भी जाओ यह खुशी सदा साथ रहे क्योंकि बाप तो सदा साथ है। खुशी में नाचते-नाचते सेवा का पार्ट बजाते चलो। अच्छा!प्रश्न:- संगमयुग की कौन-सी विशेषता है जो सारे कल्प में नहीं हो सकती?उत्तर:- संगमयुग पर ही हरेक को ''मेरा बाबा'' कहने का अधिकार है। एक को ही सब मेरा बाबा कहते हैं। मेरा कहना अर्थात् अधिकारी बनना। संगम पर ही हरेक को एक बाप से मेरे-पन का अनुभव होता है। जहाँ मेरा बाबा कहा वहाँ वर्से के अधिकारी बन गये। सब कुछ मेरा हुआ। हद का मेरा नहीं, बेहद का मेरा। तो बेहद के मेरे-पन की खुशी में रहो।प्रश्न:- समीप आत्मा की मुख्य निशानी क्या होगी?उत्तर:- समीप आत्माएं अर्थात् सदा बाप के समान हर संकल्प, हर बोल और हर कर्म करने वाली। जो समीप होंगे वह समान भी अवश्य होंगे। दूर वाली आत्माएं थोड़ी अंचली लेने वाली होंगी। समीप वाली आत्मायें पूरा अधिकार लेने वाली होंगी। तो जो बाप के संकल्प, बोल वह आपके, इसको कहा जाता है समीप।प्रश्न:- कौन सी स्मृति सदा रहे तो कभी टाइम वेस्ट नहीं करेंगे?उत्तर:- सदा यही स्मृति रहे कि अभी संगम का समय है, बहुत ऊंची लाटरी मिली है। बाप हमें हीरे जैसा देवता बना रहे हैं, जिन्हें यह स्मृति रहती वह कभी टाइम वेस्ट नहीं करते। यह नॉलेज ही सोर्स आफ इनकम है इसलिए पढ़ाई कभी भी मिस न हो।

प्रश्न:- आत्मा को सबसे प्यारी चीज़ कौन सी है? प्यार की निशानी क्या है?

उत्तर:- आत्मा को यह शरीर सबसे प्यारा है। शरीर से इतना प्यार है जो वह छोड़ना नहीं चाहती। बचाव के लिए अनेक प्रबन्ध रचती है। बाबा कहते बच्चे यह तो तमोप्रधान छी-छी शरीर है। तुम्हें अब नया शरीर लेना है इसलिए इस पुराने शरीर से ममत्व निकाल दो। इस शरीर का भान न रहे, यही है मंजिल।

प्रश्न:- किसी भी प्लैन को प्रैक्टिकल में लाने के लिए विशेष कौन सी शक्ति चाहिए?

उत्तर:- परिवर्तन करने की शक्ति। जब तक परिवर्तन करने की शक्ति नहीं होगी तब तक निर्णय को भी प्रैक्टिकल में नहीं ला सकते हैं क्योंकि हर स्थान पर हर स्थिति में चाहे स्वयं के प्रति व सेवा के प्रति परिवर्तन जरूर करना पड़ता है।

वरदान:- बालक और मालिकपन के बैलेन्स से पुरुषार्थ और सेवा में सदा सफलतामूर्त भव l

सदा यह नशा रखो कि बेहद बाप और बेहद वर्से का बालक सो मालिक हूँ लेकिन जब कोई राय देनी है, प्लैन सोचना है, कार्य करना है तो मालिक होकर करो और जब मैजॉरिटी द्वारा या निमित्त बनी आत्माओं द्वारा कोई भी बात फाइनल हो जाती है तो उस समय बालक बन जाओ। किस समय राय बहादुर बनना है, किस समय राय मानने वाला - यह तरीका सीख लो तो पुरुषार्थ और सेवा दोनों में सफल रहेंगे।

स्लोगन:- निमित्त और निमार्णचित्त बनने के लिए मन और बुद्धि को प्रभू अर्पण कर दो।

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*Thought for Today*

'In this time, being Godly children, it is our duty to spread the vibrations of peace and healing powers. Practice.'

Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidhyalaya

 (Godly Spiritual University)

Established by God, this is the World Spiritual University for Purification of Souls with the knowledge and RajaYoga taught by the Supreme Soul (God), giving his most beneficial advice. 

Established in 1936, by today has more than 8500 centres in around 140 countries. World transformation is taking place. Come and know .more

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