• Shiv Baba

आज की मुरली 20 Feb 2019 BK murli in Hindi


BrahmaKumaris murli today Hindi Aaj ki gyan murli Madhuban 20-02-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - अपने हार और जीत की हिस्ट्री को याद करो, यह सुख और दु:ख का खेल है, इसमें 3/4सुख है, 1/4दु:ख है, इक्वल नहीं''

प्रश्नः-

यह बेहद का ड्रामा बहुत ही वन्डरफुल है - कैसे?

उत्तर:-

यह बेहद का ड्रामा इतना तो वन्डरफुल है जो हर सेकण्ड सारी सृष्टि में हो रहा है, वह फिर से हूबहू रिपीट होगा। यह ड्रामा जूँ मिसल चलता ही रहता है, टिक-टिक होती रहती है। एक टिक न मिले दूसरी टिक से, इसलिए यह बड़ा वन्डरफुल ड्रामा है। जो भी मनुष्य का पार्ट अच्छा वा बुरा चलता है सब नूँध है। इस बात को भी तुम बच्चे ही समझते हो।

ओम् शान्ति।

ओम् शान्ति का अर्थ बच्चों को समझाया है क्योंकि अब आत्म-अभिमानी बने हो। आत्मा अपना परिचय देती है हम आत्मा हैं। आत्मा का स्वधर्म है शान्त। अब सभी आत्माओं के घर जाने का प्रोग्राम है। यह घर जाने का प्रोग्राम कौन बताते हैं? जरूर बाप ही बतायेगा। हे आत्मायें, अब पुरानी दुनिया ख़त्म होनी है। सभी एक्टर्स आ गये हैं। बाकी थोड़ी आत्मायें रही हैं, अब सबको वापिस जाना है। फिर पार्ट रिपीट करना है। तुम बच्चे असुल में आदि सनातन देवी-देवता धर्म के थे, पहले-पहले सतयुग में आये थे फिर पुनर्जन्म लेते-लेते अब पराये राज्य में आकर पड़े हो। यह सिर्फ तुम्हारी आत्मा जानती है और कोई नहीं जानते। तुम एक बाप के बच्चे हो। मीठे-मीठे बच्चों को बाप कहते हैं - बच्चे, तुम अब पराये रावण राज्य में आकर पड़े हो। अपना राज्य-भाग्य गँवा बैठे हो। सतयुग में देवी-देवता धर्म के थे, जिसको 5 हजार वर्ष हुए। आधाकल्प तुमने राज्य किया क्योंकि सीढ़ी नीचे भी जरूर उतरना है। सतयुग से त्रेता फिर द्वापर-कलियुग में आना है - यह भूलो नहीं। अपनी हार और जीत की जो हिस्ट्री है उनको याद करो। बच्चे जानते हैं हम सतयुग में सतोप्रधान, सुखधाम के वासी थे। फिर पुनर्जन्म लेते-लेते दु:खधाम में जड़जड़ीभूत अवस्था में आ पहुँचे हैं। अब फिर तुम आत्माओं को बाप से श्रीमत मिलती है क्योंकि आत्मा-परमात्मा अलग रहे.... तुम बच्चे बहुतकाल अलग रहे हो। पहले-पहले तुम बिछुड़े फिर सुख का पार्ट बजाते आये। फिर तुम्हारा राज्य-भाग्य छीना गया। दु:ख के पार्ट में आ गये। अब तुम बच्चों को फिर से राज्य भाग्य लेना है सुख-शान्ति का। आत्मायें कहती हैं विश्व में शान्ति हो। इस समय तमोप्रधान होने कारण विश्व में अशान्ति है।

यह भी शान्ति और अशान्ति, दु:ख और सुख का खेल है। तुम जानते हो 5 हजार वर्ष पहले विश्व में शान्ति थी। मूलवतन तो है ही शान्तिधाम। जहाँ आत्मायें रहती हैं वहाँ तो अशान्ति का प्रश्न ही नहीं। सतयुग में विश्व में शान्ति थी फिर गिरते-गिरते अशान्ति हो गई। अब सारे विश्व में शान्ति सब चाहते हैं। ब्रह्म महतत्व को विश्व नहीं कहेंगे। उनको ब्रह्माण्ड कहा जाता है, जहाँ तुम आत्मायें निवास करती हो। आत्मा का स्वधर्म है शान्त। शरीर से आत्मा अलग होने से शान्त हो जाती है फिर दूसरा शरीर ले तब चुरपुर करे। अब तुम बच्चे यहाँ किसलिए आये हो? कहते हैं - बाबा, अपने शान्तिधाम, सुखधाम में ले चलो। शान्ति अथवा मुक्तिधाम में सुख-दु:ख का पार्ट नहीं है। सतयुग है सुखधाम, कलियुग है दु:खधाम। उतरते कैसे हैं? वह तो सीढ़ी में दिखाया है। तुम सीढ़ी उतरते हो फिर एक ही बार चढ़ते हो। पावन बन चढ़ते हो और पतित बन उतरते हो। पावन बनने बिगर चढ़ नहीं सकते हो, इसलिए पुकारते हैं - बाबा, आकर हमको पावन बनाओ।तुम पहले पावन शान्तिधाम में जाकर फिर सुखधाम में आयेंगे। पहले है सुख, पीछे है दु:ख। सुख की मार्जिन ज्यादा है। इक्वल हो फिर तो कोई फ़ायदा ही नहीं। जैसे फालतू हो जाये। बाप समझाते हैं यह जो ड्रामा बना हुआ है उसमें 3/4 सुख है, बाकी 1/4 कुछ न कुछ दु:ख है, इसलिए इसको सुख-दु:ख का खेल कहा जाता है।

बाप जानते हैं मुझ बाप को सिवाए तुम बच्चों के कोई जान नहीं सकते। मैंने ही तुमको अपना परिचय दिया है और सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का परिचय दिया है। तुमको नास्तिक से आस्तिक बना दिया है। तीनों लोकों को भी तुम जानते हो। भारतवासी तो कल्प की आयु भी नहीं जानते। अब तुम ही जानते हो बाबा हमको फिर से पढ़ाते हैं। बाप गुप्त वेष में पराये देश में आये हैं। बाबा भी गुप्त है। मनुष्य अपनी देह को जानते हैं, आत्मा को जानते नहीं। आत्मा अविनाशी, देह विनाशी है। आत्मा और आत्मा के बाप को तुम्हें कभी भूलना नहीं चाहिए। हम बेहद के बाप से वर्सा ले रहे हैं। वर्सा तब मिलेगा जब पवित्र बनेंगे। इस रावण राज्य में तुम पतित हो इसलिए बाप को पुकारते हो। दो बाप हैं। परमपिता परमात्मा सभी आत्माओं का एक बाप है। ऐसे नहीं, ब्रदर्स ही सब बाप हैं। जब-जब भारत पर अति धर्म ग्लानि होती है, जब सभी धर्मों का जो पारलौकिक बाप है, उनको भूल जाते हैं, तब ही बाप आते हैं। यह भी खेल है। जो कुछ होता है खेल रिपीट होता रहता है। तुम आत्मायें कितना वारी पार्ट बजाने आती और जाती हो, यह नाटक अनादि जूँ मिसल चलता रहता है। कभी बन्द नहीं होता। टिक-टिक होती रहती है परन्तु एक टिक न मिले दूसरे से। कैसा वन्डरफुल नाटक है।

सेकण्ड-सेकण्ड जो कुछ सारी सृष्टि में होता रहता है वह फिर रिपीट होगा। जो हर धर्म के मुख्य पार्टधारी हैं उनका बताते हैं। वह सब अपना-अपना धर्म स्थापन करते हैं। राजधानी नहीं स्थापन करते हैं। एक परमपिता परमात्मा धर्म भी स्थापन करते और राजधानी अथवा डिनायस्टी भी स्थापन करते हैं। वह तो धर्म स्थापन करते हैं, उनके पिछाड़ी सबको आना है। सबको ले कौन जाता है? बाप। कोई तो बहुत थोड़ा पार्ट बजाया और ख़लास। जैसे जीव जन्तु, निकले और मरे। उनकी तो जैसे ड्रामा में बात ही नहीं। अटेन्शन किस तरफ जाता है? एक तो क्रियेटर तरफ जायेगा, जिसे सब कहते हैं ओ गॉड फादर, हे परमपिता परमात्मा। वो सभी आत्माओं का पिता है। पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। यह कितना बड़ा बेहद का झाड़ है। कितने मत मतान्तर, कितनी वेराइटी चीजें निकली हुई हैं। गिनती करना मुश्किल हो जाता है। फाउन्डेशन है नहीं। बाकी सब खड़े हैं।

बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, मैं आता ही तब हूँ जबकि अनेक धर्म हैं, एक धर्म नहीं है। फाउन्डेशन प्राय: लोप है। सिर्फ चित्र खड़े हैं। आदि सनातन था ही एक धर्म। बाकी सब बाद में आते हैं। त्रेता में बहुत हैं जो स्वर्ग में नहीं आते।तुम अब पुरूषार्थ करते हो हम स्वर्ग नई दुनिया में जायें। बाप कहते हैं स्वर्ग में तुम तब आयेंगे जब मेरे को याद कर पावन बनेंगे और दैवीगुण धारण करेंगे। बाकी झाड़ की टाल-टालियां तो अनेक हैं। बच्चों को झाड़ का भी पता पड़ा है कि हम सब आदि सनातन देवी-देवतायें स्वर्ग में थे। अब स्वर्ग है नहीं। अभी नर्क है। तब बाप ने प्रश्नावली बनाई थी कि अपने दिल से पूछो - हम सतयुगी स्वर्गवासी हैं या कलियुगी नर्कवासी हैं? सतयुग से नीचे कलियुग में उतरते हो? फिर ऊपर कैसे जायेंगे? बाप शिक्षा देते हैं। तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान कैसे बनेंगे? अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो तो योग अग्नि से तुम्हारे पाप कट जायेंगे। कल्प पहले भी तुमको ज्ञान सिखलाकर देवता बनाया था, अभी तुम तमोप्रधान बन पड़े हो। फिर जरूर कोई तो सतोप्रधान बनाने वाला होगा। पतित-पावन कोई मनुष्य तो हो न सके। हे पतित-पावन, हे भगवान् जब कहते हो तो बुद्धि ऊपर चली जाती है। वह है निराकार। बाकी सब हैं पार्टधारी।

सब पुनर्जन्म लेते रहते हैं। मैं पुनर्जन्म रहित हूँ। यह ड्रामा बना हुआ है, इसको कोई नहीं जानते। तुम भी नहीं जानते थे। अब तुमको स्वदर्शन चक्रधारी कहा जाता है। तुम अपने स्व आत्मा के धर्म में ठहरो। अपने को आत्मा निश्चय करो। बाप समझाते हैं यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, इसलिए तुम्हारा नाम है स्वदर्शन चक्रधारी और कोई को यह ज्ञान नहीं है। तो तुमको बहुत खुशी होनी चाहिए। बाप हमारा टीचर भी है। बहुत मीठा बाबा है। बाबा जैसा मीठा और कोई नहीं। तुम पारलौकिक बाप के बच्चे परलोक में रहने वाली आत्मायें हो। बाप भी परमधाम में रहते हैं। जैसे लौकिक बाप बच्चों को जन्म दे पालना कर पिछाड़ी में सब-कुछ दे जाते हैं क्योंकि बच्चे वारिस हैं, यह कायदा है। तुम जो बेहद बाप के बच्चे बनते हो, बाप कहते हैं अब सबको वापिस वाणी से परे घर जाना है। वहाँ है साइलेन्स फिर मूवी, फिर टाकी। बच्चियां सूक्ष्मवतन में जाती हैं, साक्षात्कार होता है। आत्मा निकल नहीं जाती। ड्रामा में जो नूँध है वह सेकण्ड-सेकण्ड रिपीट होता है। एक सेकण्ड न मिले दूसरे से। जो भी मनुष्य का पार्ट चलता है, अच्छा वा बुरा, सब नूँध है। सतयुग में अच्छा, कलियुग में बुरा पार्ट बजाते हैं। कलियुग में मनुष्य दु:खी होते हैं। राम राज्य में छी-छी बातें नहीं होती। राम राज्य और रावण राज्य इकट्ठा नहीं होता। ड्रामा को न जानने कारण कहते हैं दु:ख-सुख परमात्मा देते हैं।

जैसे शिवबाबा का किसको पता नहीं, वैसे रावण का भी किसको पता नहीं। शिव जयन्ती हर वर्ष मनाते हैं, तो रावण मरन्ती भी हर वर्ष मनाते हैं। अब बेहद का बाप अपना परिचय दे रहे हैं कि अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। बाप तो बहुत मीठा है। बाबा अपनी महिमा बैठ थोड़ेही करेंगे, जिनको सुख मिलता है वह महिमा करते हैं।तुम बच्चों को बाप से वर्सा मिलता है। बाप प्यार का सागर है। फिर सतयुग में तुम प्यारे मीठे बनते हो। कोई बोले वहाँ भी तो विकार आदि हैं, बोलो वहाँ रावण राज्य ही नहीं। रावण राज्य द्वापर से होता है। कितना अच्छी रीति समझाते हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी को और कोई जानते ही नहीं। इस समय ही तुमको समझाते हैं। फिर तुम देवता बन जाते हो। देवताओं से ऊंच कोई है नहीं, इसलिए वहाँ गुरू करने की दरकार नहीं। यहाँ तो ढेर गुरू हैं। सतगुरू है एक। सिक्ख लोग भी कहते हैं सतगुरू अकाल। अकाल मूर्त है ही सतगुरू। वह कालों का काल महाकाल है। वह काल तो एक को ले जाते हैं। बाप कहते हैं मैं तो सबको ले जाता हूँ। पवित्र बनाकर पहले सबको शान्तिधाम और सुखधाम में ले जाता हूँ। अगर मेरा बनकर फिर माया के बन जाते हैं, तो कहा जाता है गुरु का निन्दक ठौर न पाये। वह स्वर्ग का सम्पूर्ण सुख नहीं पा सकेंगे, प्रजा में चले जायेंगे। बाप कहते हैं - बच्चे, मेरी निंदा नहीं कराओ। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ तो दैवीगुण भी धारण करने हैं। किसको दु:ख नहीं देना। बाप कहते हैं मैं आया ही हूँ तुमको सुखधाम का मालिक बनाने। बाप है प्यार का सागर, मनुष्य हैं दु:ख देने के सागर। काम कटारी चलाकर एक-दो को दु:ख देते हैं। वहाँ तो यह बातें हैं नहीं। वहाँ है ही राम राज्य। योगबल से बच्चे पैदा होते हैं। इस योगबल से तुम सारे विश्व को पवित्र बनाते हो। तुम वारियर्स हो परन्तु अननोन। तुम बहुत नामीग्रामी बनते हो फिर भक्ति मार्ग में तुम देवियों के कितने मन्दिर बनते हैं।

कहते हैं अमृत का कलष माताओं के सिर पर रखा। गऊ माता कहते हैं, यह है ज्ञान। पानी की बात नहीं। तुम हो शिव शक्ति सेना। वह लोग फिर कॉपी कर कितने गुरू बनकर बैठे हैं। अब तो तुम सच की नईया में बैठे हो। गाते हैं नईया मेरी पार लगाओ। अब खिवैया मिला है पार ले जाने। वेश्यालय से शिवालय में ले जाते हैं। उनको बागवान भी कहते हैं, कांटों के जंगल को फूलों का बगीचा बनाते हैं। वहाँ सुख ही सुख है। यहाँ है दु:ख। बाबा ने जो पर्चे छपाने के लिए कहा है उसमें लिखा है - अपने दिल से पूछो स्वर्गवासी हो या नर्कवासी? बहुत प्रश्न पूछ सकते हो। सब कहते हैं भ्रष्टाचार है तो जरूर कोई समय श्रेष्ठाचारी भी होंगे! वह देवतायें थे, अब नहीं हैं। जब देवी-देवता धर्म प्राय: लोप हो जाता है तो भगवान को आना पड़ता है, एक धर्म की स्थापना करने। गोया तुम अपने लिए स्वर्ग की स्थापना कर रहे हो श्रीमत से। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप समान प्यार का सागर बनना है। दु:ख का सागर नहीं। बाप की निंदा कराने वाला कोई भी कर्म नहीं करना है। बहुत मीठा प्यारा बनना है।

2) योगबल से पवित्र बनकर फिर दूसरों को भी बनाना है। कांटों के जंगल को फूलों का बगीचा बनाने की सेवा करनी है। सदा खुशी में रहना है कि हमारा मीठा बाबा बाप भी है तो टीचर भी है। उन जैसा मीठा कोई नहीं।

वरदान:-

विशेषता के संस्कारों को नेचुरल नेचर बनाए साधारणता को समाप्त करने वाले मरजीवा भव

जो नेचर होती है वह स्वत: अपना काम करती है, सोचना, बनाना या करना नहीं पड़ता है लेकिन स्वत: हो जाता है। ऐसे मरजीवा जन्मधारी ब्राह्मणों की नेचर ही है विशेष आत्मा के विशेषता की। यह विशेषता के संस्कार नेचुरल नेचर बन जाएं और हर एक के दिल से निकले कि मेरी यह नेचर है। साधारणता पास्ट की नेचर है, अभी की नहीं क्योंकि नया जन्म ले लिया। तो नये जन्म की नेचर विशेषता है साधारणता नहीं।

स्लोगन:-

रॉयल वह हैं जो सदा ज्ञान रत्नों से खेलते, पत्थरों से नहीं।

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*Thought for Today*

'In this time, being Godly children, it is our duty to spread the vibrations of peace and healing powers. Practice.'

Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidhyalaya

 (Godly Spiritual University)

Established by God, this is the World Spiritual University for Purification of Souls with the knowledge and RajaYoga taught by the Supreme Soul (God), giving his most beneficial advice. 

Established in 1936, by today has more than 8500 centres in around 140 countries. World transformation is taking place. Come and know .more

Mains

Wisdom

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Om Shanti Bhawan, 

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