3 लोक का परिचय - निराकार, आकार, साकार

क्या आप जानते हैं कितने लोक होते हैं ? ब्रम्हांड  के कितने आयाम  होते हैं ?   हमारी सम्पूर्ण जानकारी  हमारी इंद्रियों के विषयो तक या इस धरती पर उपस्थित भौतिक वस्तुओ तक ही सीमित हैं ।  हमारी भौतिक जानकारी के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं की पृथ्वी या भौतिक लोक  उपस्थित हैं ।  जो कुछ  भी यहाँ  पर (पृथ्वी लोक ) हैं  वह भौतिक हैं, अर्थात यहाँ उपस्थित वस्तुओं को छूकर, देखकर या सूंघकर महसुस किया जा सकता हैं।   हम इसे साकार लोक  कहते हैं । केवल इस साकार लोक में ही संसार रूपी ड्रामा 5000 वर्षो के चक्र के रूप में खेला जाता हैं । यही हमारी "वास्तविक" दुनिया हैं ।

इसके अलावा एक और लोक  हैं,  विचारो से निर्मित लोक (विचारो की दुनिया )।   इस लोक में कोई आवाज या भौतिक वस्तुए नही होती हैं । यह लोक पूरी तरह से विचारो के प्रवाह पर निर्भर हैं। यह लोक हमारे मन /मस्तिष्क की तरह हैं, जिसका निर्माण और प्रगति हमारे स्वयं के विचारो के द्वारा होती  हैं । हम इसे सूक्ष्म लोक कहते हैं । यह लोक हमारे विचारो के रंगों के द्वारा निर्मित और परिवर्तित होती हैं । यह लोक  फरिश्तो का लोक हैं (जैसा की हम उन्हें कहते हैं) ।   यहां मनुष्यो का शरीर विभिन्न विचारो के रंगों के प्रकाश  द्वारा बना हुआ होता हैं, किसी भी आत्मा के इन रंगो को देखकर, हम उस आत्मा के स्वाभाव के बारे में जान सकते हैं । वैसे यहां पर भौतिक लोक ही दोहराया गया  हैं। यहाँ पर पृथ्वी से सम्बन्धित कोई भी वस्तु नहीं होती , लेकिन यहां मनुष्य आत्माये होती हैं, जिनका शरीर प्रकाश से बना हुआ  होता हैं।  किसी आत्मा में जितने अधिक गुण होते हैं, सूक्ष्म लोक  में उसका शरीर उतना अधिक रंगो से भरा हुआ होता हैं। आत्मा जितनी अधिक ज्ञानवान और शक्तिशाली होती हैं, उतना अधिक तेजस्वी उसका आभा मंडल होता हैं। यह सम्पूर्ण स्वतंत्र लोक होता हैं।
 

उपरोक्त दोनों लोको  से परे तीसरा लोक  हैं, जो ईश्वर/ परमपिता परमात्मा का स्थायी निवास स्थान हैं। इस आत्म लोक में इसके नाम के अनुसार केवल सूक्ष्म प्रकाश  बिंदु स्वरुप में आत्माएँ निवास करती हैं। यह ब्रम्हाण्ड का उच्चतम आयाम हैं। यहाँ पर जीवन, समय  या भावनाएँ अनुपस्थित होती हैं। यहां पर सिर्फ आप, स्वयं  परमपिता परमात्मा और अनादि मीठी प्यारी शांति बनी रहती हैं...इसके बारे में केवल स्मरण करने मात्र से भी (मनुष्य ) आत्मा का शुद्धिकरण होता हैं। हाँ, यहाँ  किसी भी प्रकार की शारीरिक अनुभूति नहीं होती हैं। इसके बहुत सारे नाम हैं जैसे ब्रम्ह लोक, शांति धाम , मीठा वतन , प्रकाश धाम , परमधाम , निर्वाण धाम, आवाज से परे दुनिया इत्यादि ..... ।

निराकार आत्मा की दुनिया, आकार फरिस्तो की दुनिया और साकार दुनिया (सृस्टि)

स्थूल लोक, सूक्ष्म लोक तथा ब्रह्मा लोक।

1. स्थूल लोक

इसे मनुष्य-लोक, साकार-लोक, पृथ्वी-लोक व कर्मक्षेत्र भी कहा गया हैं। इसी संसार रूपी रंगमंच पर हम सभी आत्माएं इस भौतिक शरीर को धारण कर कर्म करती हैं व दुःख-सुख का खेल करती हैं और इन्हीं के आधार पर फ़ल भोगती हैं। यहाँ मनुष्य-सृष्टि रूपी नाटक चलता रहता हैं और इस नाटक की अवधि 5000 वर्ष हैं। आत्मा अपने अभिनय और कर्मों के फ़लस्वरूप बार-बार शरीर बदलती हैं। एक आत्मा अधिकतम 84 जन्म ले सकती हैं और न्यूनतम 1 जन्म। सब कर्मों के आधार पर ही होता हैं। इसी कर्मक्षेत्र पर ही आत्मा अच्छे कर्म कर अपने भविष्य और आने वाले जन्म की नींव रखती हैं, फिर नाटक पूरा होने पर वापिस अपने वास्तविक घर चली जाती हैं।

2. सूक्ष्म लोक

इस साकारी मनुष्य लोक के ऊपर सूर्य-चाँद, तारागण व आकाश तत्व के पार एक और लोक हैं जहाँ ब्रह्मा-विष्णु-शंकर अपनी-अपनी सूक्ष्म पुरियों में रहते हैं। वहां पर इनकी काया पांच तत्वों की न बनी होकर, बल्कि प्रकाशमय होती हैं इन्हें इन स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता। इन्हें दिव्या नेत्रों द्वारा ही देखा जा सकता हैं। इस लोक में जन्म-मरण या दुःख-सुख नहीं होता हैं और न ही ध्वनि होती हैं। यहाँ बोलते हैं पर आवाज़ नहीं होती। इसे वाइसलेस वर्ल्ड (Voiceless World) भी कहते हैं।

3. ब्रह्मलोक

सूक्ष्म लोक से भी ऊपर जो आखिरी लोक हैं उसे परलोक, ब्रह्मलोक अथवा परमधाम भी कहते हैं, यहाँ न स्थूल शरीर होता हैं न सूक्ष्म और न ही ध्वनि या कर्म या वचन या दुःख-सुख। यहाँ चारों ओर शांति ही शांति होती हैं इसलिए इसे शान्तिधाम, मुक्तिधाम ओर निर्वाणधाम भी कहते हैं। यहाँ एक ज्योंति तत्व व्यापक हैं जिसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं यह ब्रह्म-तत्व चेतन नहीं हैं बल्कि सत-रज-तम से न्यारा छठा तत्व हैं। इस अखंड ज्योति ब्रह्म-तत्व में सभी आत्माएं अशरीरी रूप में, अपने वास्तविक प्रकाश स्वरूप में संकल्प-विकल्प रहित, दुःख-सुख से न्यारी, निर्लेप अवस्था में अपने पिता – परमात्मा (परम+आत्मा) के साथ रहती हैं इसी अवस्था को मुक्ति कहा जाता हैं। यही आत्मा का वास्तविक घर हैं और आत्मा यहीं से सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकर अपने पार्ट के अनुरूप माता के गर्भ में शरीर रूपी वेशभूषा धारण करके जन्म लेती हैं।

जन्म-जन्मांतर शरीर के संबंधों को निभाते-निभाते आत्मा की आसक्ति देह में हो गई और आत्मा अपने ज्योंति स्वरूप को भूल कर स्वयं को यह पांच तत्वों से बना शरीरी (देह) समझने लगी। और इसी के परिणामस्वरूप आत्मा का आचार-व्यवहार तथा खान-पान विकारो के वशीभूत हो गया, जो कर्मइन्द्रियां आत्मा की सहायक, अंग अथवा गुलाम होती थी आज वह मालिक बन गई हैं और आत्मा को बेबस कर दिया हैं।

यह चित्र 3 दुनिया दिखा रहा है (साकर दुुनिया, सूक्ष्म लोक और परमधाम)

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